दिल्ली में प्रदूषण कोई नई समस्या नहीं रही है, लेकिन अब यह समस्या इस हद तक पहुंच चुकी है कि इसे केवल पर्यावरणीय संकट कहना कम होगा। यह एक मानवीय त्रासदी का रूप ले चुकी है। हालिया अध्ययन ने एक बार फिर इस सच्चाई को उजागर किया है कि राजधानी दिल्ली की हवा में घुला जहर सिर्फ दिल्ली की देन नहीं है। करीब 65 फीसदी प्रदूषण शहर के बाहर से आता है, खासतौर पर एनसीआर के अन्य जिलों और पड़ोसी राज्यों से। दिल्ली अपने स्तर पर केवल 35 फीसदी प्रदूषण के लिए जिम्मेदार है। इसके बावजूद सबसे ज्यादा बदनाम भी दिल्ली ही होती है और सबसे ज्यादा मार भी यहीं के लोगों को झेलनी पड़ती है। दिल्ली की भौगोलिक स्थिति इसे प्रदूषण के मामले में बेहद संवेदनशील बनाती है। उत्तर और उत्तर पश्चिम दिशा से चलने वाली हवाएं हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पंजाब के औद्योगिक क्षेत्रों, खेतों और शहरी इलाकों से उठे धुएं और धूल को दिल्ली में लाकर पटक देती हैं। सर्दियों में हालात और बिगड़ जाते हैं क्योंकि ठंडी हवा के कारण वातावरण में ऐसी परत बन जाती है जो प्रदूषक कणों को ऊपर उठने नहीं देती। नतीजा यह होता है कि दिल्ली की हवा में पीएम 2.5 और पीएम 10 जैसे बेहद सूक्ष्म कण कई गुना खतरनाक स्तर तक पहुंच जाते हैं। नई स्टडी बताती है कि सर्दियों के मौसम में दिल्ली के भीतर गाड़ियों से निकलने वाला धुआं लोकल पीएम 2.5 प्रदूषण का करीब आधा हिस्सा बनाता है। यह योगदान इंडस्ट्री, निर्माण कार्यों और कचरा या ईंधन जलाने जैसे स्रोतों से भी ज्यादा है। दिल्ली की सड़कों पर वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ट्रैफिक जाम में फंसे वाहन घंटों धुआं उगलते रहते हैं। पुरानी डीजल गाड़ियां आज भी सड़कों पर दौड़ रही हैं और सार्वजनिक परिवहन अभी भी जरूरत के मुकाबले अपर्याप्त है। लेकिन इन सबके बावजूद कुल मिलाकर बाहरी प्रदूषण ही सबसे बड़ा खिलाड़ी बनकर सामने आता है। रिपोर्ट में यह भी साफ कहा गया है कि दिल्ली की प्रदूषण समस्या को केवल शहर की सीमाओं के भीतर रहकर हल नहीं किया जा सकता। यह एक क्षेत्रीय समस्या है और इसका समाधान भी क्षेत्रीय स्तर पर ही संभव है। दिल्ली सरकार चाहे जितने प्रतिबंध लगा ले, अगर एनसीआर और पड़ोसी राज्यों में हालात नहीं सुधरते तो राजधानी को राहत नहीं मिल सकती। यही वजह है कि हर साल वही कहानी दोहराई जाती है। सर्दी आते ही हवा जहरीली हो जाती है, स्कूल बंद होते हैं, निर्माण कार्य रुकते हैं, गाड़ियां सड़कों से हटाई जाती हैं और कुछ दिनों बाद सब कुछ फिर सामान्य मान लिया जाता है। हालांकि पराली जलाने के मोर्चे पर 2025 की सर्दी ने एक उम्मीद की किरण जरूर दिखाई है। आंकड़ों के मुताबिक इस दौरान पराली जलाने से दिल्ली के पीएम 2.5 प्रदूषण में करीब 10.6 फीसदी की कमी आई है, जो 2024 की तुलना में एक बड़ी राहत मानी जा सकती है। 15 अक्टूबर से 30 नवंबर के बीच जब पराली जलाने का सबसे ज्यादा असर होता है, उस दौरान 2025 में इसका औसत योगदान 4.9 फीसदी रहा जबकि 2024 में यही आंकड़ा 15.5 फीसदी था। यह बताता है कि अगर नीतियां सही हों और उन्हें ईमानदारी से लागू किया जाए तो हालात सुधर सकते हैं। इसके बावजूद 12 नवंबर 2025 को एक दिन ऐसा भी आया जब पराली से प्रदूषण का योगदान 22.47 फीसदी तक पहुंच गया, जो यह याद दिलाने के लिए काफी है कि खतरा अभी टला नहीं है। दिल्ली और एनसीआर में प्रदूषण का असर अब केवल आंखों में जलन या सांस लेने में दिक्कत तक सीमित नहीं रहा। यह लोगों की जिंदगी छीन रहा है। अस्पतालों में अस्थमा, एलर्जी, हृदय रोग और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। बच्चों के फेफड़े पूरी तरह विकसित होने से पहले ही कमजोर हो रहे हैं। बुजुर्गों के लिए यह हवा मौत को दावत देने जैसी है। गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं पर इसका असर अलग और बेहद खतरनाक है। कई शोध यह संकेत दे चुके हैं कि वायु प्रदूषण के कारण समय से पहले मौतों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। यह संकट सामाजिक असमानता को भी गहराता है। अमीर लोग एयर प्यूरीफायर, बंद गाड़ियां और महंगे इलाज का सहारा ले सकते हैं, लेकिन गरीब और मजदूर वर्ग के पास ऐसा कोई विकल्प नहीं होता। खुले में काम करने वाले, सड़क किनारे रहने वाले और झुग्गियों में बसे लोग इस जहर को सबसे ज्यादा मात्रा में अपने भीतर लेते हैं। उनके लिए प्रदूषण कोई मौसम नहीं बल्कि रोज की मजबूरी है। सरकारें भी इस स्थिति में अक्सर मजबूर नजर आती हैं। ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान जैसे उपाय कागजों पर मजबूत दिखते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इनका असर सीमित ही रहता है। ऑड ईवन, पटाखों पर प्रतिबंध और निर्माण कार्यों पर रोक जैसे फैसले तात्कालिक राहत देते हैं, स्थायी समाधान नहीं। असल जरूरत इस बात की है कि दिल्ली एनसीआर और पड़ोसी राज्य मिलकर एक साझा रणनीति बनाएं, जिसमें जवाबदेही तय हो और राजनीतिक इच्छाशक्ति साफ नजर आए। अगर आगे की राह की बात करें तो यह साफ है कि केवल एक क्षेत्र या एक सरकार के बूते यह लड़ाई नहीं जीती जा सकती। परिवहन व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव जरूरी है। सार्वजनिक परिवहन को इतना मजबूत और सुविधाजनक बनाना होगा कि लोग निजी गाड़ियों से दूरी बनाएं। इलेक्ट्रिक वाहनों को तेजी से अपनाना होगा। उद्योगों को स्वच्छ ईंधन की ओर जाना ही पड़ेगा। निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण अब विकल्प नहीं बल्कि अनिवार्यता बननी चाहिए। कचरा जलाने पर पूरी तरह रोक और उसके लिए मजबूत व्यवस्था जरूरी है। किसानों को पराली न जलाने के लिए केवल दंड नहीं बल्कि व्यवहारिक और आर्थिक विकल्प भी देने होंगे। इस लड़ाई में नागरिकों की भूमिका भी कम नहीं है। जब तक समाज खुद यह नहीं मानेगा कि स्वच्छ हवा उसका अधिकार है और जिम्मेदारी भी, तब तक हालात नहीं बदलेंगे। हर छोटी आदत मायने रखती है। कारपूल करना, सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करना, कचरा न जलाना और पेड़ों की रक्षा करना जैसे कदम किसी एक दिन में चमत्कार नहीं करेंगे, लेकिन लंबे समय में यही बदलाव की नींव बनेंगे। दिल्ली की हवा आज लोगों से त्राहिमाम करवा रही है। सांस लेना एक संघर्ष बन गया है। बच्चे मास्क पहनकर स्कूल जाने को मजबूर हैं और बुजुर्ग घरों में कैद हो चुके हैं। अगर अब भी इस संकट को गंभीरता से नहीं लिया गया तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। प्रदूषण सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं है, यह जीवन और मृत्यु का सवाल बन चुका है। हवा पर किसी एक शहर का हक नहीं होता और उसकी जिम्मेदारी भी किसी एक पर नहीं छोड़ी जा सकती। दिल्ली की जहरीली हवा यह साफ संदेश दे रही है कि अब आधे अधूरे उपाय नहीं, बल्कि ठोस और साझा समाधान का समय आ चुका है। (L 103 जलवंत टाऊनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड, नियर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार, सहित्यकार,स्तम्भकार) ईएमएस / 07 जनवरी 26