इसे अराजकता कहें या गुंडई वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी इस बात की तस्दीक करती है कैसे विश्व की हथियारों से लैस महाशक्तियां सिर्फ अपने निजी हितों के लिए नैतिकता को ताक पर रख कर अंतरराष्ट्रीय नियम कायदों को धता बताती है और कमजोर देश का गला दबा कर उसे अपना ओपनिवेश बनाने का प्रयास करते हैं। वेनेजुएला के प्राकृतिक संसाधनों तेल के बड़े भंडार पर अमेरिकी प्रभुत्व की लालसा, कमजोर देशों पर उसकी दादागिरी को उजागर किया है। वेनेजुएला संकट, एक तरह से तमाम अंतरराष्ट्रीय न्याय का हनन और पावर का मनमाना दुरुपयोग है। अमेरिका लंबे समय से दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला को सबक सिखाना चाहता था, क्योंकि वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो उसके सामने झुकने को तैयार नहीं थे। मादुरो पर अमेरिका में ड्रग का धंधा या नाकों टेररिज्म बढ़ाने का आरोप लगाकर ट्रंप ने वेनेजुएला की राजधानी काराकास सहित कई शहरों पर हवाई हमला करवाया। अमेरिकी फौज ने मादुरो व उनकी पत्नी को आधी रात में घसीटकर बाहर निकाला और गिरफ्तार किया, वह उन्हें न्यूयॉर्क ले जाएगी, जहां उन पर नशे के व्यापार पर केस चलेगा और सजा होगी। ट्रंप ने कहा कि वेनेजुएला में फिलहाल अमेरिका ही सत्ता संभालेगा। इसी तरह 3 दशक पूर्व अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रोनाल्ड रोगन ने अपने देश में नशे का कारोबार फैलाने के आरोप में पनामा के राष्ट्रपति नरेगा को गिरफ्तार कर उम्रकैद की सजा दी थी। अमेरिकी सीक्रेट एजेंट पनामा से नरेगा को पकड़कर अमेरिका लाए थे। अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दिखा दिया कि वह भी इतने शक्तिसंपन्न हैं कि किसी देश के राष्ट्रपति को भी मुश्कें बांधकर अपने यहां ला सकते हैं। अब डर है कि कहीं वह मेक्सिको पर भी ऐसी कार्रवाई न करें क्योंकि वहां से बड़ी तादाद में अवैध प्रवासी अमेरिका में घुसपैठ करते हैं। ट्रंप ने पिछली बार मेक्सिको बॉर्डर पर ऊंची दीवार बनाने की बात कही थी। इसी प्रकार डेनमार्क की नाराजगी की परवाह न करते हुए ट्रंप ग्रीनलैंड पर भी कब्जा कर सकते हैं। अमेरिका ने इराक पर हमला करने के लिए सद्दाम हुसैन पर आरोप लगाया था कि वह केमिकल व बायोलॉजिकल शस्त्र बना रहे हैं। सद्दाम का सफाया कर दिया गया, लेकिन ऐसा कोई शस्त्र वहां नहीं पाया गया। अमेरिका ने ईरान की तेल कंपनियों पर अपना कब्जाबरकरार रखने के लिए वहां के लोकप्रिय प्रधानमंत्री मुसद्दिक की हत्या करवाई थी और ईरान के शाह रजा पहलवी को वहां का शासन सौंपा था। ब्रिटेन की आयरन लेडी कहलाने वाली तत्कालीन प्रधानमंत्री मारग्रेट चैचर ने अपने देश से बहुत दूर फाकलैंड द्वीप पर कब्जा दिखाने के लिए अर्जेंटीना से युद्ध किया था। इस वॉर में ब्रिटेन के काफी संसाधन खर्च हुए थे। ऐसी ही अकड़ के चलते रूस-यूक्रेन युद्ध लगातार जारी है। रूस ने यूक्रेन पर आरोप लगाया कि उसने पुतिन के मास्को स्थित सरकारी निवास पर हवाई हमला किया। जब रूस की वायुरक्षा प्रणाली इतनी मजबूत है तो वहां यूक्रेन का मिसाइल या ड्रोन कैसे आ सकता है? असली बात यह है कि हमले का बहाना खोजने के लिए मनमाने आरोप लगाए जाते हैं। वैश्वीकरण की गति को धीमा करने वाले डोनाल्ड ट्रंप ने भारत सहित विश्व के अन्य देशों पर टैरिफ लगाकर व्यापार युद्ध को स्थिति पैदा कर दी। ट्रंप प्रशासन उन अनेक बहुपक्षीय संस्थाओं की या तो फंडिंग कम कर रहा है या उनसे बाहर निकलने की धमकियां देकर उनकी भूमिका को कमजोर करने का प्रयास कर रहा है, जो कथित तौर पर अमेरिका के हित में कार्य नहीं कर रही हैं। उनकी इस नीति का असर केवल बाहरी दुनिया तक सीमित नहीं है, बल्कि अमेरिका के भीतर भी इसका व्यापक आर्थिक और सामाजिक प्रभाव पड़ रहा है।व्यापार युद्ध ने न केवल विदेशी व्यापार को झटका दिया है, बल्कि अमेरिका के घरेलू बाजार में मूल्य वृद्धि को भी बढ़ावा दिया है। अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ के प्रतिरोध में अन्य देशों द्वारा लगाए जाने वाले जवाबी टैरिफ से अमेरिकी उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति प्रभावित हो रही है। अमेरिका में न सिर्फ रोजमर्रा की वस्तुएं, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, खिलौने, कपड़े, मशीनें आदि के महंगे होने से अमेरिका में मार्च 2025 के बाद से आयातित सामान की कीमतें लगभग चार प्रतिशत बढ़ी हैं, जबकि घरेलू सामान की कीमतें लगभग दो प्रतिशत बढ़ गई हैं। बढ़ती महंगाई को देखते हुए ट्रंप ने 200 से अधिक वस्तुओं पर से टैरिफ कम करने का फैसला किया है। अमेरिका में उद्योगों के लिए कच्चा माल महंगा होने से बढ़ती उत्पादन लागत से नौकरियां ही नहीं घट रही हैं, बल्कि किसानों की आय पर भी गहरा असर पड़ रहा है। चीन, कनाडा और यूरोपीय देशों द्वारा प्रतिशोध में लगाए गए टैरिफ के कारण अमेरिकी सोया और मक्का जैसी कृषि वस्तुओं की मांग घाटी है, जिससे किसानों की आय में गिरावट आने से सरकार को अरबों डालर को सब्सिडी देनी पड़ रही है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर इसके दुष्परिणाम अब स्पष्ट दिखने लगे हैं। येल विश्वविद्यालय के बजट अध्ययन केंद्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, टैरिफ और विदेशी प्रतिकारात्मक करों के कारण 2025 में अमेरिका की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर लगभग 0।9 प्रतिशत अंक कम हो रही है। टैरिफ नीतियों के कारण एक आम अमेरिकी परिवार को औसतन 3,800 डालर तक का नुकसान उठाना पड़ रहा है। वहीं पेन-वार्टन बजट माडल का विश्लेषण बताता है कि ट्रंप की व्यापारिक नीतियों के कारण अमेरिका की जीडीपी दीर्घकाल में लगभग छह प्रतिशत तक घट सकती है और मजदूरी में लगभग पांच प्रतिशत की गिरावट आ सकती है। ओईसीडी ने अपनी हालिया रिपोर्ट में कहा है कि यदि टैरिफ और एकतरफा व्यापार नौतियां जारी रहीं तो 2026 तक अमेरिका की जीडीपी वृद्धि दर 1।6 प्रतिशत तक गिर सकती है। यह गिरावट न केवल अमेरिका, बल्कि विश्व अर्थव्यवस्था के लिए भी चिंता का कारण होगी, क्योंकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था वैश्विक व्यापार का मुख्य इंजन है। आम अमेरिकी इस नीतिगत बदलाव की सबसे बड़ी कीमत चुका रहे हैं। उच्य मूल्य, घटती आय और रोजगार के अवसरों में कमी ने अमेरिकी सपने को धारणा को कमजोर किया है। ट्रंप की मनमानी नीतियों का अमेरिका में विरोध भी शुरू हो चुका है। एक हालिया सर्वेक्षण में लगभग 55 प्रतिशत अमेरिकी नागरिकों ने कहा कि ट्रंप अब एक खतरनाक तानाशाह की तरह व्यवहार कर रहे हैं। वह अपने विरोधियों को निशाना बनाने के लिए सरकारी संस्थाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं। यही कारण है कि उनके नेतृत्व में अमेरिका का लोकतांत्रिक ढांचा पहले की अपेक्षा अधिक विभाजित हो गया है। हंड्स आफ और नो किंग जैसे आंदोलनों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिकी जनता अब अधिक हस्तक्षेप और केंद्रीकृत शाक्ति के विरोध में एकजुट हो हो रही है। हिचकोले खा रही अमेरिकी अर्थव्यवस्था के संदर्भ में ट्रंप की राष्ट्रवादी नीतियां और अधिक चुनौतीपूर्ण साबित हो रही हैं। अमेरिका प्रथम के उनके नारे ने जहां कुछ समय के लिए घरेलू उद्योगों को सहारा दिया, वहीं वैश्विक व्यापारिक साझेदारियों से दूरी ने अमेरिकी बाजार पर नकारात्मक प्रभाव डाला है। अंतरराष्ट्रीय निवेश घटा है,निर्यात पर दबाव बढ़ा है और डालर की अस्थिरता से आयात महंगा हुआ है। यहां बता देंकि नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मारिया कोरिना मचाडो, जो वेनेज़ुएला में विपक्ष की प्रमुख नेता हैं, ने अंतरिम राष्ट्रपति के पद पर रोड्रिगेज़ की नियुक्ति को नकार दिया है। मचाडो ने दो-टूक सुना दिया है कि वह रोड्रिगेज़ को वेनेज़ुएला की अंतरिम राष्ट्रपति नहीं मानेंगी। गौरतलब है कि मचाडो फिलहाल निर्वासन में हैं लेकिन जल्द ही देश वापस लौटने की योजना बना रही हैं। गौरतलब है कि मादुरो की किडनैपिंग के बाद मचाडो को वेनेज़ुएला की अगली राष्ट्रपति बनने का प्रबल दावेदार बताया जा रहा था। उन्हें ट्रंप का समर्थक भी माना जाता है, लेकिन इसके बावजूद ट्रंप प्रशासन ने उन्हें देश की नई अंतरिम राष्ट्रपति बनाने पर ग्रीन सिग्नल नहीं दिया। बहरहाल दुनिया अमेरिका की दादागिरी पर स्तब्ध है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं) ईएमएस / 07 जनवरी 26