राज्य
08-Jan-2026
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- भ्रष्टाचार के जंगल में तबादलों की कुल्हाड़ी - अवैध कटाई, आरामदायक तबादला - जंगल कम, तबादले ज्यादा भोपाल (ईएमएस)। मध्य प्रदेश वन विभाग में बुधवार को ऐसा प्रशासनिक भूचाल आया कि जंगल से लेकर मंत्रालय तक कुर्सियां हिल गईं। 28 आईएफएस और 20 राज्य वन सेवा अधिकारियों के तबादलों ने सरकार की मंशा तो साफ कर दी कि वह “कुछ बड़ा” दिखाना चाहती है, लेकिन असली सवाल अब भी खड़ा है- क्या इस कवायद से जंगल बचेंगे या सिर्फ फाइलों और अफसरों की दिशा बदलेगी? सरकार इस पूरे फेरबदल को “नई ऊर्जा, नई सोच और बेहतर कार्यक्षमता” का नाम दे रही है, मगर विभागीय गलियारों में इसे खुलेआम “भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने की पारंपरिक दवा” कहा जा रहा है। वर्षों से अवैध कटाई, लकड़ी माफिया, राजनीतिक संरक्षण और अफसरों की मिलीभगत के आरोप वन विभाग पर लगते रहे हैं। जब यह मुद्दा विधानसभा तक पहुंचा और सवाल तीखे हुए, तो अचानक तबादलों की बारिश शुरू हो गई। सबसे चर्चित मामला नर्मदापुरम का है। यहां सागौन और साल के पेड़ों की खुलेआम अवैध कटाई होती रही। जंगल उजड़ते रहे, लकड़ी माफिया मालामाल होते रहे और जिम्मेदार अधिकारी निरीक्षण, बैठकों और कागजी कार्रवाई में व्यस्त दिखे। जब मामला तूल पकड़ने लगा, तो डीएफओ मयंक गुर्जर को हटाकर वन मुख्यालय में अटैच कर दिया गया। मतलब साफ है जंगल कटे तो चलेगा, ज्यादा से ज्यादा भोपाल बुला लिए जाओगे, जहां एसी की हवा और सुरक्षित कुर्सी मिलेगी। नीचे तक संदेश साफ पहुंच गया कि कार्रवाई नहीं, सिर्फ “आरामदायक ट्रांसफर” होगा। पीसीसीएफ बिभाष ठाकुर को संरक्षण शाखा से हटाकर अनुसंधान एवं विस्तार शाखा की जिम्मेदारी सौंप दी गई। सवाल उठ रहा है कि जब संरक्षण ही ठीक से नहीं हो पाया, तो अब अनुसंधान में कौन सा चमत्कार होने वाला है? वहीं संजय टाइगर रिजर्व से अमित कुमार दुबे को भोपाल बुलाकर संरक्षण शाखा दे दी गई। यानी चेहरे बदले, कुर्सी बदली, लेकिन व्यवस्था वही पुरानी, जहां जवाबदेही सबसे कमजोर कड़ी है। हकीकत यह है कि मध्य प्रदेश के जंगलों में पेड़ों से ज्यादा तेजी से तबादला आदेश गिरते हैं। हर बड़े घोटाले के बाद एक तय फार्मूला अपनाया जाता है, जांच, चार्जशीट की चर्चा और फिर तबादला। निलंबन, बर्खास्तगी या ठोस सजा अब वन विभाग में दुर्लभ प्रजाति बन चुकी है। ठीक वैसे ही जैसे बाघों के इलाकों में इंसानी लापरवाही से खत्म होते जंगल। वन विभाग में अब यह आम धारणा बन चुकी है कि “कटाई हो जाए तो चिंता मत करो, ज्यादा से ज्यादा ट्रांसफर होगा।” जंगल रोते हैं, वन्यजीव सिमटते हैं, लेकिन कार्रवाई फाइलों में दब जाती है। अगर इस बड़े प्रशासनिक फेरबदल के बाद भी अवैध कटाई, माफिया और संरक्षण के नाम पर खेल जारी रहता है, तो साफ हो जाएगा कि यह भ्रष्टाचार पर वार नहीं, बल्कि एक और प्रशासनिक लीपापोती थी। जंगल बचेंगे या नहीं, यह आने वाला वक्त बताएगा। फिलहाल इतना तय है कि मध्य प्रदेश में पेड़ों से ज्यादा तेजी से तबादलों की गिनती बढ़ रही है। - 15 डीएफओ बदले, माफिया जस के तस इस फेरबदल में 15 डीएफओ बदले गए, कई टाइगर रिजर्व में अधिकारियों को इधर से उधर किया गया। लेकिन सवाल वही है क्या, लकड़ी माफिया के भी ट्रांसफर हो गए? क्या जिन अधिकारियों पर गंभीर आरोप हैं, उनसे कोई जवाबदेही तय हुई? या फिर यह पूरा अभ्यास सिर्फ जनता को यह दिखाने के लिए है कि “सरकार सख्त है”, जबकि जमीनी हकीकत में माफिया और भ्रष्टाचार बेफिक्र हैं। - खाली पद, भरे विवाद तबादला सूची ने कई चौंकाने वाले तथ्य भी उजागर किए। सिवनी सर्किल का वन संरक्षक पद साल भर से खाली है। पन्ना नेशनल पार्क में करीब नौ महीने से फील्ड डायरेक्टर नहीं है, लेकिन इस अहम पद को भरने की जरूरत किसी को महसूस नहीं हुई। विभाग में चर्चा है कि सिवनी सर्किल के लिए “मैनेजर टाइप” कोई योग्य अफसर नहीं मिल रहा। यानी जंगल हैं, चुनौतियां हैं, लेकिन जिम्मेदारी उठाने वाला कोई नहीं। नियम किताबों तक सीमित अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों के लिए बने तबादला बोर्ड के नियम कहते हैं कि यदि किसी अफसर को दो साल से पहले हटाया जाए तो कारण बताना अनिवार्य है। लेकिन यह नियम पीसीसीएफ बिभाष ठाकुर और डीएफओ डिंडोरी पुनीत सोनकर के मामले में हवा हो गया। धार टेंडर घोटाले में हटाए गए अशोक कुमार सोलंकी को महज दो महीने में फिर से प्राइम पोस्टिंग देकर डिंडोरी डीएफओ बना दिया गया। वहीं गंभीर आरोपों से घिरे कुछ अधिकारियों को प्रभारी डीसीएफ जैसे महत्वपूर्ण पद सौंपे गए। संदेश साफ है, आरोप हों तो घबराइए मत, सिस्टम संभाल लेगा।