बृहन्मुंबई महानगरपालिका यानी बीएमसी के आगामी चुनावों से पहले महाराष्ट्र की राजनीति में लंबे समय बाद ऐसा दृश्य सामने आया, जिसने न सिर्फ सियासी हलकों बल्कि आम जनता का भी ध्यान खींचा। शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे एक साथ मंच पर दिखे और संयुक्त प्रेस वार्ता के जरिए सत्ताधारी गठबंधन, चुनावी प्रक्रिया और संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर तीखा प्रहार किया। यह केवल दो नेताओं की साझा उपस्थिति भर नहीं थी, बल्कि यह संकेत था कि महाराष्ट्र की राजनीति में एक नई धुरी आकार ले सकती है, खासकर उस समय जब बीएमसी जैसे देश के सबसे समृद्ध नगर निकाय का चुनाव नजदीक है। उद्धव ठाकरे ने अपने भाषण में जिस तरह “लोकतंत्र से झुंडशाही” की ओर देश के बढ़ने का आरोप लगाया, वह बयानबाजी से कहीं आगे की बात थी। उन्होंने कहा कि पहले वोट चोरी होते थे, अब उम्मीदवार चुराए जा रहे हैं। यह टिप्पणी सीधे-सीधे दलबदल, दबाव की राजनीति और सत्ता के दुरुपयोग की ओर इशारा करती है। उद्धव ठाकरे का यह आरोप कि रंगे हाथों पकड़े जाने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं होती, लोकतंत्र की बुनियादी संस्थाओं पर गहरे सवाल खड़े करता है। उनका प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर किया गया तंज और चुनाव आयोग को दी गई खुली चुनौती, यह दर्शाती है कि विपक्ष अब रक्षात्मक नहीं, बल्कि आक्रामक मुद्रा में है। राज ठाकरे ने अपने अंदाज में भाजपा पर पलटवार करते हुए दोहरे मापदंडों का आरोप लगाया। उन्होंने पश्चिम बंगाल का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां निर्विरोध चुने गए उम्मीदवारों के खिलाफ भाजपा सुप्रीम कोर्ट तक गई थी, लेकिन महाराष्ट्र में इसी तरह की परिस्थितियों पर वही पार्टी चुप है। राज ठाकरे का यह सवाल सिर्फ भाजपा के लिए नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति में सिद्धांत और सुविधा के बीच बढ़ती खाई को भी उजागर करता है। उन्होंने चेतावनी दी कि कोई भी सत्ता स्थायी नहीं होती और जो यह मान बैठे हैं कि वे हमेशा सत्ता में रहेंगे, उन्हें इतिहास से सबक लेना चाहिए। राज ठाकरे का यह कहना कि महाराष्ट्र को उत्तर प्रदेश और बिहार की राह पर ले जाया जा रहा है, भावनात्मक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर अहम है। महाराष्ट्र हमेशा से सामाजिक सुधार, औद्योगिक विकास और प्रगतिशील राजनीति का केंद्र रहा है। यदि यहां की राजनीति में भय, दमन और अवसरवाद हावी होता है, तो यह केवल राज्य ही नहीं, पूरे देश के लिए नकारात्मक संकेत होगा। राज ठाकरे ने विचारधाराओं के बार-बार बदलने को लोकतंत्र के लिए खतरनाक बताया, और यह टिप्पणी मौजूदा दौर के राजनीतिक पलायन पर सटीक बैठती है। उद्धव ठाकरे ने छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम पर भी तीखा सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि समुद्र में पूजा करने और पौराणिक उपलब्धियों से खुद को जोड़ने के बावजूद आज तक शिवाजी महाराज की प्रतिमा सामने नहीं आई। यह बयान प्रतीकात्मक राजनीति और वास्तविक कामकाज के अंतर को उजागर करता है। शिवाजी महाराज महाराष्ट्र की अस्मिता का प्रतीक हैं और उनके नाम पर राजनीति करना आसान है, लेकिन उनके आदर्शों के अनुरूप शासन करना कहीं अधिक कठिन। चुनाव आयोग और विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर पर उद्धव ठाकरे के आरोप इस पूरी प्रेस वार्ता का सबसे गंभीर हिस्सा रहे। रिटर्निंग अधिकारियों के कॉल रिकॉर्ड सार्वजनिक करने की मांग और विधानसभा अध्यक्ष पर उम्मीदवारों व मतदाताओं को धमकाने का आरोप, संवैधानिक मर्यादाओं को लेकर गहरी चिंता पैदा करता है। यदि संवैधानिक पदों पर बैठे लोग निष्पक्षता छोड़कर सत्ता पक्ष के हित में काम करने लगें, तो लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होना स्वाभाविक है। उद्धव ठाकरे का यह कहना कि विधानसभा अध्यक्ष को निलंबित किया जाना चाहिए और उनके खिलाफ मामला दर्ज होना चाहिए, राजनीति में जवाबदेही की मांग को सामने लाता है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प और महत्वपूर्ण प्रश्न महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना यानी मनसे की भूमिका और कर्तव्य को लेकर उठता है। राज ठाकरे की पार्टी लंबे समय से मराठी अस्मिता, स्थानीय रोजगार और मुंबई की पहचान के मुद्दों पर मुखर रही है। बीएमसी चुनाव में मनसे की भूमिका केवल सीटों की गणित तक सीमित नहीं होनी चाहिए। यदि ठाकरे बंधुओं की यह साझा हुंकार महज सत्ता विरोधी बयानबाजी बनकर रह जाती है, तो इसका असर सीमित होगा। लेकिन यदि मनसे अपने मूल एजेंडे को लोकतांत्रिक मूल्यों, पारदर्शिता और स्थानीय स्वशासन की मजबूती से जोड़ती है, तो यह गठजोड़ महाराष्ट्र की राजनीति में सार्थक बदलाव ला सकता है। मनसे का कर्तव्य है कि वह भावनात्मक मुद्दों के साथ-साथ प्रशासनिक और शहरी समस्याओं पर भी ठोस दृष्टिकोण रखे। मुंबई आज बुनियादी ढांचे, आवास, परिवहन, पर्यावरण और सामाजिक असमानता जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है। बीएमसी चुनाव केवल सत्ता का नहीं, बल्कि शहर के भविष्य का चुनाव है। मनसे यदि उद्धव ठाकरे के साथ मिलकर एक ऐसा संयुक्त घोषणापत्र पेश करती है, जो केवल विरोध नहीं बल्कि समाधान भी दे, तो यह मतदाताओं के बीच भरोसा पैदा कर सकता है। ठाकरे बंधुओं की यह साझा उपस्थिति अतीत की कड़वाहट को पीछे छोड़ने का संकेत भी देती है। कभी एक ही राजनीतिक विरासत से निकले ये दोनों नेता वर्षों तक एक-दूसरे के कट्टर विरोधी रहे। ऐसे में उनका एक मंच पर आना यह दर्शाता है कि परिस्थितियां किस तरह राजनीति को नए समीकरण गढ़ने पर मजबूर करती हैं। सवाल यह है कि क्या यह एक स्थायी राजनीतिक समझ की शुरुआत है या केवल चुनावी मजबूरी का परिणाम। बीएमसी चुनाव से पहले उठी यह सियासी हलचल साफ संकेत देती है कि आने वाले दिन महाराष्ट्र की राजनीति के लिए निर्णायक होंगे। सत्ता पक्ष पर लगे आरोप, लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल और विपक्ष की एकजुटता की कोशिश, यह सब मिलकर चुनाव को बेहद रोचक और तनावपूर्ण बना रहे हैं। ठाकरे बंधुओं की साझा हुंकार केवल एक प्रेस वार्ता नहीं, बल्कि यह संदेश है कि महाराष्ट्र की राजनीति में असंतोष गहराता जा रहा है। अंततः यह फैसला जनता के हाथ में होगा कि वह इस साझा हुंकार को परिवर्तन की उम्मीद के रूप में देखती है या इसे एक और राजनीतिक प्रयोग मानकर खारिज कर देती है। लेकिन इतना तय है कि बीएमसी चुनाव अब सिर्फ नगर निकाय का चुनाव नहीं रह गया है, बल्कि यह लोकतंत्र, संस्थाओं की साख और महाराष्ट्र की राजनीतिक दिशा तय करने की लड़ाई बन चुका है। (वरीष्ठ पत्रकार, सहित्यकार,स्तम्भकार) (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../ 9 जनवरी /2026