अंतर्राष्ट्रीय
12-Jan-2026
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लंदन (ईएमएस)। आम धारणा होती है कि अल्बर्ट आइंस्टीन जैसे महान वैज्ञानिक के लिए कोई भी गणितीय सवाल बेहद आसान होगा। मगर इस आम धारणा में उतनी सच्चाई नहीं थी। महान वैज्ञानिक आइंस्टीन कई बार स्वयं स्वीकार कर चुके थे कि कुछ साधारण दिखने वाले सवाल उन्हें गहराई से सोचने पर मजबूर कर देते थे। ऐसी ही एक पहेली, जो देखने में पांचवीं कक्षा के स्तर की लगती है, ने आइंस्टीन को इतना प्रभावित किया कि वह इसके पीछे छिपे तर्क और सीमाओं पर लंबे समय तक विचार करते रहे। यह दिलचस्प पहेली उन्हें उनके मित्र मैक्स वर्थाइमर ने भेजी थी, जो एक प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक थे। दोनों के बीच अक्सर हल्की-फुल्की लेकिन दिमाग को चुनौती देने वाली पहेलियों पर चर्चा होती रहती थी। इस सवाल का मकसद आइंस्टीन की फिजिक्स या गणित की परीक्षा लेना नहीं था, बल्कि यह देखने का एक तरीका था कि इंसानी दिमाग किसी समस्या को किस तरह समझता है। पहली नजर में यह सवाल बेहद सीधा लगता है, लेकिन जैसे-जैसे इसमें गहराई से उतरते हैं, यह अपने भीतर एक ऐसा गणितीय जाल छिपाए हुए है, जिससे बच पाना मुश्किल हो जाता है। पहेली के अनुसार, एक बहुत पुरानी कार को कुल दो मील की दूरी तय करनी है। इसमें पहला मील पहाड़ की चढ़ाई का है और दूसरा मील ढलान का। कार की हालत खराब है, इसलिए वह चढ़ाई वाले हिस्से में 15 मील प्रति घंटे से ज्यादा की औसत रफ्तार नहीं पकड़ सकती। अब सवाल यह पूछा जाता है कि ढलान वाले दूसरे मील में कार को कितनी रफ्तार से चलना चाहिए, ताकि पूरी दो मील की यात्रा की औसत गति 30 मील प्रति घंटा हो जाए। सामान्य सोच यही कहती है कि अगर एक मील 15 की स्पीड से तय हुआ है तो दूसरा मील 45 की स्पीड से तय कर लिया जाए। लेकिन यहीं पर हमारी सहज समझ धोखा खा जाती है। असल गणित पर नजर डालें तो पूरी दो मील की यात्रा को 30 मील प्रति घंटे की औसत रफ्तार से पूरा करने के लिए कुल समय सिर्फ चार मिनट मिलता है। अब अगर पहले मील की चढ़ाई को 15 मील प्रति घंटे की रफ्तार से तय किया जाए, तो उसमें पूरे चार मिनट लग जाते हैं। यानी कार ने अपना पूरा समय पहले ही मील में खर्च कर दिया। अब दूसरे मील के लिए एक सेकंड भी नहीं बचता। इसका मतलब यह हुआ कि कार को ढलान वाले हिस्से में शून्य समय में दूरी तय करनी होगी, जो केवल अनंत गति से ही संभव है। साफ है कि यह वास्तविक दुनिया में असंभव है। यही वजह है कि इस पहेली का कोई वास्तविक गणितीय समाधान मौजूद नहीं है। यह सवाल हमें यह सिखाता है कि औसत रफ्तार केवल स्पीड का जोड़ नहीं होती, बल्कि कुल दूरी और कुल समय का अनुपात होती है। एक बार समय की सीमा खत्म हो जाए, तो बाद में कितनी भी तेजी दिखा ली जाए, नुकसान की भरपाई नहीं की जा सकती। आइंस्टीन को इस पहेली में यही बात सबसे ज्यादा पसंद आई। सुदामा/ईएमएस 12 जनवरी 2026