जबलपुर (ईएमएस)। शिव के निश्वास से आगम परंपरा का उद्भव हुआ, जो वीर शैव लिंगायत परंपरा का आधार है, पर प्रत्येक मनुष्य के हृदय में अंगुष्ठ प्रणाम प्राणज्योत होती है, उसी का साकार रुप शिवलिंग है। भारतीय संस्कृती गुरु प्रधान है, शिव परम गुरु है। शिव ही जगत का मूलाधार है। एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति उपासना तत्व एकही है, परंतु विद्वान अलग अलग रूप से व्याख्या करते है। वीर शैव लिंगायत परंपरा के अंतर्गत पारलौकिक साधना शिवलिंग आराधना से फलिभूत होती है। वीर शैवलिंगायत परंपरा मे जीव-शिव साधना के साथ सामाजिक समानता, जातिगत भेदभाव का विरोध, कर्मकांडों का सरलीकरण पर बल दिया जाता है। यह कहना है 108 स्वामी ब्रम्हचैतन्य महाराज बुलढ़ाणा का। वे मराठी साहित्य अकादमी एवं दत्त भजन मंडल के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित मकर संक्रमण व्याख्यानमाला के अंतर्गत शिवलिंगायत परंपरा विषय पर अपने उद्बोधन क दौरान बोल रहे थे। कार्यक्रम का शुभारंभ रवींद्र परांजपे द्वारा लोकमान्य तिलक जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण से हुआ। अतिथी वक्ता का स्वागत मराठी अकादमी के निदेशक संतोष गोडबोले, प्रज्ञा चौधरी, अजय नाहटकर, विजय भावे द्वारा श्रीफल एवं शाल से किया गया। मंच संचालन आभार प्रदर्शन संजय आपटे ने किया। इस अवसर पर अनिल दांडेकर, शरद आठले, अभय गोरे, श्रीमती शुभदा परांजपे, पद्माकर तलवारे, सदानंद गोडबोले आदि गणमान्य नागरिक उपस्थित थे। सुनील साहू / मोनिका / 13 जनवरी 2026/ 2.30