कीव (ईएमएस)। यूक्रेन पर रूस का आक्रमण अब चार साल से अधिक समय से जारी है, और इस संघर्ष ने सिर्फ बोलीवियर की सीमाओं तक असर नहीं डाला है बल्कि वैश्विक भू-राजनीति के ढांचे को भी प्रभावित किया है। फरवरी 2022 में रूस ने यूक्रेन पर आक्रमण किया, जिसका उद्देश्य क्रीमिया के साथ-साथ डोनबास जैसे क्षेत्रों पर भी अपना प्रभाव मजबूत करना था। शुरू में अपेक्षा थी कि युद्ध जल्दी समाप्त हो जाएगा, लेकिन यह अब कई सालों तक खिंच चुका है और यूरोपीय देशों ने यूक्रेन को व्यापक सैन्य एवं आर्थिक समर्थन देना शुरू कर दिया है। कुछ विश्लेषक मानते हैं कि रूस, अमेरिका और यूक्रेन के बीच कूटनीतिक समाधान करीब है, लेकिन युद्ध अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। वहीं अमेरिका ने ग्रीनलैंड जैसी रणनीतिक स्थिति वाले क्षेत्रों में अपनी सक्रियता बढ़ाई है, ताकि आर्कटिक में अपनी पकड़ मजबूत रख सके और रूस तथा चीन को नियंत्रण से बाहर न होने दे। इसतरह के प्रयासों को नाटो और अन्य पक्षों से भी सैन्य तैयारी की प्रतिक्रियाएँ मिल रही हैं, जिससे वैश्विक सैन्य तनाव और गहरा रहा है। क्या दुनिया दो ध्रुवों में बंट रही है? दूसरे विश्व युद्ध के बाद शीत युद्ध की अवधि में दुनिया बाइपोलर थी। अमेरिका और सोवियत संघ के नेतृत्व में दो स्पष्ट ध्रुव थे। परंतु शीत युद्ध के अंत के बाद सोवियत संघ टूटा और अमेरिका एक-मात्र सुपर ताकत बन गया। लेकिन बाद के दशक में चीन, भारत, यूरोपीय संघ, और अन्य उभरती शक्तियों के साथ दुनिया मल्टीपोलर हो चुकी है। लेकिन रूस और अमेरिका के बीच सैन्य और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा ज़रूर है, लेकिन यह अकेले दुनिया का ढांचा निर्धारित नहीं कर रही। विश्व में चीन, भारत, ईयू, और अन्य शक्तियाँ भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं, जो किसी स्पष्ट दो-ध्रुवीय विभाजन में शामिल होने को तैयार नहीं हैं। कई विश्लेषक चेतावनी देते हैं कि वर्तमान तनाव शीत युद्ध जैसा संकेत दिखाते हैं, लेकिन आर्थिक जुड़ाव, वैश्विक आपूर्ति-नेटवर्क और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के कारण यह 20वीं सदी के कोल्ड वॉर जैसा बंटाव नहीं है। कई देश अमेरिका-रूस के बीच स्पष्ट खांचे चुनने के बजाय स्वतंत्र संतुलन नीति अपना रहे हैं। भारत जैसे देश, जो आर्थिक और सुरक्षा हितों के आधार पर गतिविधियाँ तय करते हैं, वह दो ध्रुवों में संकीर्ण विभाजन नहीं चाहते। क्या लौटेगा शीत युद्ध का दौर? दूसरे विश्व युद्ध के बाद दुनिया वाशिंगटन और मॉस्को के बीच बंट गई थी। 1991 में सोवियत संघ के पतन के बाद अमेरिका एकमात्र महाशक्ति बना, लेकिन वैश्वीकरण ने भारत, चीन और यूरोपीय संघ जैसे नए शक्ति केंद्र खड़े किए। आज स्थिति लोडेड बंदूक जैसी है। रूस और अमेरिका जिस तरह देशों को पाला चुनने पर मजबूर कर रहे हैं, वह फिर से 1950 के दशक की याद दिलाता है। अगर दुनिया दो हिस्सों में बंटती है, तो परमाणु हथियारों की मौजूदगी के कारण एक छोटी सी चिंगारी भी वैश्विक तबाही का कारण बन सकती है। आशीष दुबे / 14 जनवरी 2026