खेल
17-Jan-2026
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नई दिल्ली (ईएमएस)। गुरु रमाकांत आचरेकर की कोचिंग से भारतीय क्रिकेट को कई महान खिलाड़ी मिले, लेकिन सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली को उनकी सबसे बड़ी खोज माना जाता है। जहां सचिन ने अपनी प्रतिभा का भरपूर उपयोग कर क्रिकेट इतिहास में अमर स्थान हासिल किया, वहीं विनोद कांबली की कहानी अपार प्रतिभा के बावजूद अधूरी रह गई। क्रिकेट विशेषज्ञों की राय में कांबली की कुदरती बल्लेबाजी और टाइमिंग कई बार सचिन से भी बेहतर मानी गई, लेकिन वह अपनी इस क्षमता के साथ न्याय नहीं कर सके। 18 जनवरी 1972 को मुंबई में जन्मे विनोद कांबली का क्रिकेट सफर बचपन से ही सचिन तेंदुलकर के साथ जुड़ा रहा। दोनों ने शारदाश्रम विद्यामंदिर की ओर से स्कूल क्रिकेट में 664 रनों की नाबाद साझेदारी कर इतिहास रच दिया, जो आज भी एक अटूट रिकॉर्ड है। यही पारी कांबली के करियर का पहला बड़ा पड़ाव बनी। घरेलू क्रिकेट में उनकी आक्रामक बल्लेबाजी और बेखौफ अंदाज ने उन्हें जल्द ही सुर्खियों में ला दिया। घरेलू स्तर पर शानदार प्रदर्शन के बाद कांबली ने 1993 में इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण किया। अपने दूसरे ही टेस्ट में मुंबई में 224 रन की ऐतिहासिक पारी खेलकर उन्होंने सबको चौंका दिया। इसके बाद दिल्ली में जिम्बाब्वे के खिलाफ 227 रन बनाकर उन्होंने अपनी प्रतिभा पर मुहर लगा दी। इन पारियों के दम पर कांबली सबसे तेज 1,000 टेस्ट रन बनाने वाले बल्लेबाज बने और उन्हें भारत का अगला महान बल्लेबाज कहा जाने लगा। हालांकि, शुरुआती सफलता के बाद कांबली उस स्तर को कायम नहीं रख सके। विदेशी पिचों पर तेज और उछाल वाली गेंदबाजी के खिलाफ उनकी कमजोरी उजागर होने लगी। चोटें, फिटनेस की समस्या और स्वभाव से जुड़े सवालों ने भी उनके करियर को प्रभावित किया। मैदान के बाहर विवादों और लाइफस्टाइल की चर्चाओं ने हालात और कठिन बना दिए। लगातार निराशाजनक प्रदर्शन के बाद उन्हें टीम से बाहर कर दिया गया और एक सुनहरे करियर का अंत उम्मीदों से पहले ही हो गया। कांबली ने 17 टेस्ट मैचों में 1,084 रन और 104 वनडे में 2,477 रन बनाए, लेकिन आज वह आर्थिक और शारीरिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं। उनकी कहानी भारतीय क्रिकेट में एक ऐसी मिसाल बन गई है, जो बताती है कि प्रतिभा के साथ निरंतरता, अनुशासन और समर्पण भी उतने ही जरूरी हैं। डेविड/ईएमएस 17 जनवरी 2026