अंतर्राष्ट्रीय
19-Jan-2026
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वाशिंगटन(ईएमएस)।16 जनवरी 2026 की तारीख एक ऐतिहासिक मोड़ के रूप में दर्ज हो गई है। यह वह दिन था जब दुनिया एक और विनाशकारी महायुद्ध की दहलीज पर खड़ी नजर आ रही थी। मध्य पूर्व में तनाव अपने चरम पर था और चारों ओर यही चर्चा थी कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप किसी भी क्षण ईरान पर सीधी सैन्य कार्रवाई का आदेश दे सकते हैं। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, ट्रंप ने मन बना लिया था कि इस बार तेहरान की सत्ता में आमूलचूल परिवर्तन करना है। इसके लिए ईरान के पूर्व शाही परिवार के वंशज रजा पहलवी के साथ उनकी गुप्त बैठकें भी हो चुकी थीं और तख्तापलट का पूरा खाका तैयार था। लेकिन, अचानक ऐसा क्या हुआ कि ट्रंप जैसे सख्त फैसले लेने वाले राष्ट्रपति को अपने कदम पीछे खींचने पड़े? ट्रंप ने ईरान को धमकाया पर भीतर से खुद भी डरे भी रहे, उन्हे पता था ईरान पर हमला, मतलब तेल और गैस के लिए त्राहिमाम मचना है। व्हाइट हाउस के इस रणनीतिक बदलाव के पीछे सबसे बड़ी वजह अरब देशों की संगठित कूटनीति और उनके साझा क्षेत्रीय हितों को माना जा रहा है। कूटनीतिक गलियारों में यह खबर पुख्ता है कि सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने स्वयं राष्ट्रपति ट्रंप को फोन कर संयम बरतने की पुरजोर अपील की थी। सऊदी नेतृत्व को इस बात का गहरा अंदेशा था कि यदि अमेरिका ने ईरान पर हमला किया, तो तेहरान की जवाबी कार्रवाई केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगी। ईरान अपनी शक्ति का प्रदर्शन पूरे खाड़ी क्षेत्र में कर सकता है, जिससे वहां के तमाम तेल संपन्न देश युद्ध की आग में झुलस सकते हैं। सऊदी अधिकारियों का मानना था कि ईरान की प्रतिक्रिया अमेरिकी सैन्य ठिकानों के साथ-साथ वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए भी काल बन सकती है। तेल और गैस की आपूर्ति में मामूली व्यवधान भी पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को मंदी की गर्त में धकेलने के लिए काफी था। सऊदी अरब के अलावा कतर, ओमान और मिस्र जैसे प्रमुख इस्लामी देशों ने भी एकजुट होकर अमेरिका पर दबाव बनाया। इन देशों का स्पष्ट तर्क था कि मध्य पूर्व पहले से ही अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है और एक नया युद्ध इस क्षेत्र को पूरी तरह तबाह कर देगा। इन देशों को डर था कि यदि ईरान को हाशिए पर धकेला गया, तो वह अपने समर्थक गुटों के जरिए पूरे क्षेत्र में हिंसा भड़का सकता है। इस सामूहिक लॉबिंग ने ट्रंप प्रशासन को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि ईरान पर हमला केवल एक द्विपक्षीय संघर्ष नहीं रहेगा, बल्कि यह एक वैश्विक संकट में तब्दील हो जाएगा। हालांकि, ट्रंप के इस यू-टर्न से अमेरिकी प्रशासन के भीतर मतभेद भी उभरकर सामने आए हैं। रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम जैसे कट्टरपंथियों ने अरब देशों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि उन्होंने निर्णायक कार्रवाई को रोका है, तो वे भरोसेमंद सहयोगी नहीं हैं। वहीं, कुछ रिपोर्ट्स यह भी बताती हैं कि उपराष्ट्रपति जेडी वांस ने भी इस मुद्दे पर गहन चर्चा की थी। वांस का रुख इस मामले में चौंकाने वाला रहा है, क्योंकि वे अक्सर मध्य पूर्व के युद्धों से अमेरिका को दूर रखने की वकालत करते रहे हैं। अंततः, सऊदी अरब की पहल, वैश्विक अर्थव्यवस्था को बचाने की चिंता और क्षेत्रीय सुरक्षा के समीकरणों ने ट्रंप को युद्ध के रास्ते से पीछे हटा दिया। यह घटनाक्रम स्पष्ट करता है कि अब वैश्विक राजनीति में केवल सैन्य ताकत ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय देशों की सामूहिक कूटनीति भी महाशक्तियों के निर्णयों को बदलने की क्षमता रखती है। वीरेंद्र/ईएमएस 19 जनवरी 2026