बीजिंग,(ईएमएस)। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक टैरिफ नीति और अमेरिका फर्स्ट के सिद्धांत ने वैश्विक व्यापार और राजनीति के स्थापित समीकरणों को हिला कर रख दिया है। ट्रंप के हालिया फैसलों और बयानों ने न केवल चीन जैसे प्रतिद्वंद्वियों, बल्कि कनाडा और यूरोपीय संघ जैसे पारंपरिक सहयोगियों को भी कूटनीतिक रूप से असहज कर दिया है। टैरिफ की निरंतर धमकियों और व्यापारिक दबाव के इस माहौल में, चीन ने अत्यंत चतुराई भरी रणनीति अपनाते हुए वैश्विक मंच पर खुद को एक वैकल्पिक और स्थिर शक्ति के रूप में पेश करना शुरू कर दिया है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग उन देशों को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रहे हैं जो वाशिंगटन की अनिश्चित नीतियों के कारण खुद को हाशिए पर महसूस कर रहे हैं। इस कूटनीतिक बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण कनाडा के साथ हुआ हालिया समझौता है। कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की बीजिंग यात्रा को एक ऐतिहासिक मोड़ माना जा रहा है, क्योंकि यह पिछले आठ वर्षों में किसी कनाडाई प्रधानमंत्री की पहली चीन यात्रा है। 16 जनवरी 2026 को बीजिंग के ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल में शी जिनपिंग और कार्नी के बीच हुई यह उच्च स्तरीय वार्ता ऐसे समय में हुई है, जब डोनाल्ड ट्रंप ने कनाडा को अमेरिका का ‘51वां राज्य’ बनाने जैसी विवादास्पद टिप्पणी की है। इन बयानों से उपजी नाराजगी के बीच ओटावा और बीजिंग ने कृषि, ऊर्जा और वित्त जैसे क्षेत्रों में नई रणनीतिक साझेदारी पर सहमति जताई है। विशेष रूप से, कनाडा ने चीनी इलेक्ट्रिक वाहनों पर लगाए गए 100 प्रतिशत टैरिफ को कम करने का संकेत दिया है, जिसके बदले चीन कनाडाई कृषि उत्पादों के लिए अपने बाजार खोलेगा। कनाडा के अलावा, दक्षिण कोरिया भी इसी राह पर चलता दिख रहा है। राष्ट्रपति ली जे-म्योंग की हालिया चीन यात्रा छह वर्षों में किसी दक्षिण कोरियाई नेता की पहली ऐसी यात्रा थी, जिसमें आर्थिक सहयोग बढ़ाने और अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव को कम करने पर चर्चा हुई। इसी क्रम में, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे यूरोपीय देश भी संतुलन साधने की कोशिश कर रहे हैं। ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर जहां अपनी चीन यात्रा की रूपरेखा तैयार कर रहे हैं, वहीं जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मेर्ज फरवरी 2026 में बीजिंग जाने की तैयारी में हैं। जर्मनी का मुख्य उद्देश्य अपनी ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री को अमेरिकी टैरिफ और चीनी प्रतिस्पर्धा के दोहरे दबाव से बचाना है। विश्लेषकों का मानना है कि चीन खुद को एक भरोसेमंद और व्यावहारिक साझेदार के रूप में पेश करके जी 7 देशों के भीतर मतभेद पैदा करने में सफल हो रहा है। बीजिंग की यह मुस्कुराती कूटनीति सीधे तौर पर ट्रंप की धमकी भरी कूटनीति का जवाब है। यदि अमेरिका के सहयोगी देश इसी तरह बीजिंग के करीब जाते रहे, तो आने वाले समय में वैश्विक शक्ति संतुलन में एक बड़ा और स्थाई बदलाव देखने को मिल सकता है, जो दशकों से चली आ रही अमेरिकी प्रभुत्व वाली व्यवस्था को चुनौती दे सकता है। वीरेंद्र/ईएमएस 19 जनवरी 2026