क्षेत्रीय
20-Jan-2026
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_*गुना (ईएमएस)।* जिले के प्रमुख शिव स्थल केदारनाथ धाम के पट खोले जाने की मांग को लेकर मंगलवार को बड़ी संख्या में साधु-संत, महंत और धर्माचार्य लामबंद होकर कलेक्टोरेट पहुंचे। सभी ने एकजुट होकर जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपा और चेतावनी दी कि यदि शिवरात्रि से पहले मंदिर के कपाट नहीं खोले गए तो आंदोलन को उग्र रूप दिया जाएगा। साधु-संतों ने स्पष्ट कहा कि वर्षों से बंद पटों के कारण श्रद्धालुओं की आस्था को ठेस पहुंच रही है और धार्मिक परंपराएं बाधित हो रही हैं। ज्ञापन में बताया गया कि ग्राम पंचायत क्षेत्र में स्थित यह प्राचीन शिव मंदिर द्वापर युग से जुड़ी मान्यताओं का प्रतीक है और लंबे समय से श्रद्धा का केंद्र रहा है। प्रशासन ने पुरातत्व विभाग की एक रिपोर्ट के आधार पर चट्टान चटकने और हादसे की आशंका जताते हुए लगभग दो वर्ष पहले मंदिर के कपाट बंद करा दिए थे। साधु-संतों का कहना है कि इतने लंबे समय में न तो कोई चट्टान गिरी और न ही किसी स्थायी सुरक्षा व्यवस्था पर ठोस कार्रवाई हुई। इसके बावजूद दर्शन पर रोक बनाए रखना मनगढ़ंत आशंकाओं के आधार पर श्रद्धालुओं को वंचित करने जैसा है। जिला पंचायत सदस्य और वन समिति अध्यक्ष की ओर से सौंपे गए ज्ञापन में कहा गया कि कपाट बंद होने से भक्तों की भावनाएं आहत हैं और आस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। हर वर्ष शिवरात्रि पर यहां भव्य मेले का आयोजन होता रहा है, लेकिन पट बंद होने के बाद से यह परंपरा भी ठप पड़ गई है। आगामी शिवरात्रि को देखते हुए कपाट शीघ्र खोले जाने और मेले के आयोजन की अनुमति देने की मांग प्रमुखता से उठाई गई। षड्दर्शन विश्व अखाड़ा परिषद से जुड़े महंतों और साधु-संतों के संयुक्त ज्ञापन में प्रशासन से सवाल किया गया कि यदि सुरक्षा का हवाला है तो स्थायी समाधान क्यों नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि पुरातत्व संरक्षण के नाम पर मंदिर को सील करना उचित नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक तरीके से सुरक्षा उपाय कर श्रद्धालुओं के दर्शन सुनिश्चित किए जाने चाहिए। ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया कि प्रशासनिक उपेक्षा के चलते धार्मिक भावनाओं का दमन हो रहा है, जिससे असंतोष बढ़ रहा है। साधु-संतों ने पंचनामा का हवाला देते हुए कहा कि स्थल का निरीक्षण कर आवश्यक सुरक्षा प्रबंध किए जा सकते हैं और दर्शन शुरू कराए जा सकते हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि शिवरात्रि से पहले कपाट नहीं खोले गए और मेला शुरू नहीं हुआ तो साधु-संत स्वयं पूजा-अर्चना प्रारंभ करेंगे और आंदोलन को सत्याग्रह का रूप दिया जाएगा। उन्होंने इसकी पूरी जिम्मेदारी शासन और प्रशासन पर डालते हुए कहा कि अब श्रद्धालुओं की आस्था की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।_*- सीताराम नाटानी*_