लेख
21-Jan-2026
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जहाँ ‘मैं’ मिटता है, वहीं से सच्ची प्रगति का मार्ग खुलता है मनुष्य स्वभाव से ही महत्त्वाकांक्षी है। वह जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहता है, सम्मान, प्रतिष्ठा और सफलता की ऊँचाइयों को छूने की आकांक्षा रखता है। यह आकांक्षा अपने आप में न तो गलत है और न ही अनुचित, परंतु जब यही आकांक्षा अहंकार का रूप ले लेती है, तब वह उन्नति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बन जाती है। अहंकार ऐसा तत्त्व है, जो मनुष्य को भीतर से खोखला कर देता है और बाहर से उसे मजबूत होने का भ्रम देता है। वास्तव में यही भ्रम उसके पतन का कारण बनता है। जीवन-विकास का इतिहास गवाह है कि जिसने अहंकार को गले लगाया, वह शीघ्र या देर से गिरा ही है और जिसने विनम्रता को अपनाया, उसने स्थायी सम्मान और यश प्राप्त किया है। अहंकार को एक विचारक ने आलपिन की उपमा दी है। आलपिन कागज में प्रवेश तो कर जाती है, लेकिन उसका बड़ा सिर उसे आगे बढ़ने से रोक देता है। ठीक यही स्थिति अहंकारी व्यक्ति की होती है। वह कुछ हद तक आगे बढ़ जाता है, किंतु उसका ‘मैं’ उसे उससे आगे नहीं जाने देता। अहंकार मनुष्य की बुद्धि को सीमित कर देता है, उसकी दृष्टि को संकीर्ण बना देता है और उसे आत्ममुग्धता के अंधकार में धकेल देता है। इसके विपरीत जो व्यक्ति मान-अभिमान से दूर रहता है, वह शांत भाव से निरंतर आगे बढ़ता रहता है। जैन आगम ग्रंथ भगवती आराधना में कहा गया है कि निरभिमानी मनुष्य जन-जन को प्रिय लगता है और वही ज्ञान, यश तथा धन प्राप्त कर अपने कार्यों को सिद्ध करता है। यह कथन केवल धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि जीवन का व्यावहारिक सत्य है। अहंकार केवल एक दोष नहीं, बल्कि अनेक कषायों का मूल है। विशेष रूप से क्रोध का जन्म अहंकार से ही होता है। जब तक मनुष्य के भीतर ‘मैं’ की भावना प्रबल रहती है, तब तक उसे छोटी-छोटी बातों पर चोट लगती रहती है। हर बात उसे अपने अस्तित्व पर आघात लगती है। एक रोचक कथा में फुटबॉल से पूछा गया कि दुनिया तुम्हें ठोकर क्यों मारती है। फुटबॉल ने उत्तर दिया कि उसके भीतर अहंकार की हवा भरी है और वही हवा उसे ठोकरें खिलवाती है। जब वह हवा निकल जाती है, तब वही फुटबॉल पैरों से ठुकराने के बजाय हाथों में उठा लिया जाता है। यह कथा गहरे जीवन-सत्य को प्रकट करती है। अहंकार जब तक भीतर भरा रहता है, तब तक मनुष्य को समाज की ठोकरें खानी ही पड़ती हैं। जिन लोगों ने इतिहास में अहंकार किया है, वे अंततः समाज की दृष्टि में गिरे हैं। मनुष्य को यह समझना चाहिए कि शुभ कर्मों से जो कुछ उसे प्राप्त हुआ है, वह स्थायी नहीं है। उस पर इठलाना बुद्धिमानी नहीं है। वैभव की चमकती धूप में खड़ा व्यक्ति यदि दूसरों के दुःख की छाया का उपहास करता है, तो यह उसके अहंकार का परिचायक है। आज जिस संपत्ति, सत्ता या प्रतिष्ठा पर उसे गर्व है, वह कल छिन भी सकती है। शरणार्थी शिविरों में रहने वाले वे लोग कभी अपार संपत्ति के स्वामी रहे होंगे। भूकंप, बाढ़ और युद्ध जैसे संकटों ने कितनों को रातोंरात शून्य कर दिया है। गुजरात भूकंप के बाद एक पिता का विलाप, जिसने अपने बेटे की बीमारी पर विदेशों से दवाएँ मंगवाई थीं, लेकिन मृत्यु के समय कफन के लिए भी कुछ नहीं बचा था, अहंकार के खोखलेपन को उजागर करता है। यह घटनाएँ हमें सिखाती हैं कि धन, सत्ता और वैभव पर गर्व करना आत्मघाती है। सच्चा सम्मान और स्थायी यश पाने के लिए अहंकार का त्याग अनिवार्य है। महाभारत का प्रसंग इस सत्य को गहराई से समझाता है। जब कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध निश्चित हुआ, तब अर्जुन श्रीकृष्ण के पास सहायता मांगने पहुँचे। श्रीकृष्ण ने एक ओर स्वयं को निःशस्त्र रूप में और दूसरी ओर अपनी सुसज्जित नारायणी सेना को विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया। अर्जुन ने सेना के बजाय कृष्ण को चुना और उन्हें अपना सारथी बनाया। यह चयन अहंकार से रहित विवेक का परिचायक था। श्रेष्ठ सारथी वही होता है, जो कठिन परिस्थितियों में भी रथ को सही दिशा में ले जाए। यही विवेक जीवन का मार्गदर्शक बनता है और अहंकार को त्यागने से ही विवेक जाग्रत होता है। कौरवों की पराजय केवल शस्त्रों से नहीं, बल्कि उनके भीतर पल रही सात बुराइयों के कारण हुई। लोभ, मोह, काम, क्रोध, ईर्ष्या, अहंकार और मद, ये सात दोष मनुष्य के भीतर के कुरुक्षेत्र में निरंतर संघर्ष करते रहते हैं। दुर्योधन लोभ का प्रतीक था, भीष्म मोह का, दुःशासन काम का, अश्वत्थामा क्रोध का, शकुनी ईर्ष्या का, कर्ण अहंकार का और द्रोणाचार्य मद का। इन दोषों से युक्त व्यक्ति कभी विजय प्राप्त नहीं कर सकता। मनुष्य का शरीर भी एक कुरुक्षेत्र है, जहाँ हर क्षण संघर्ष चलता रहता है। यदि मन रूपी धृतराष्ट्र अंधा बना रहे और विवेक रूपी कृष्ण सारथी न बने, तो जीवन की हार निश्चित है। इतिहास सत्ता के अहंकार से गिरे अनेक शासकों के उदाहरणों से भरा पड़ा है। नेपोलियन, हिटलर और मुसोलिनी जैसे शक्तिशाली शासक अपने समय में अजेय माने जाते थे, लेकिन उनका अंत अत्यंत दयनीय हुआ। नेपोलियन का यह कहना कि असंभव शब्द उसके शब्दकोश में नहीं है, उसके अहंकार की चरम सीमा को दर्शाता है। वही नेपोलियन अंत में सेंट हेलेना द्वीप पर कैदी के रूप में मरा। हिटलर, जिसने पूरे यूरोप पर विजय का सपना देखा था, एक बुरी मौत मरा और उसे कफन तक नसीब नहीं हुआ। यह उदाहरण बताते हैं कि सत्ता का अहंकार मनुष्य को अंधा कर देता है। कुछ लोग अपने सौंदर्य पर अहंकार करते हैं, पर सौंदर्य कभी स्थायी नहीं रहता। शरीर रोगों का घर है और समय के साथ उसका क्षय निश्चित है। कुछ लोग ज्ञान का अहंकार करते हैं। शास्त्रों के कुछ शब्द कंठस्थ कर लेने मात्र से स्वयं को सर्वज्ञ समझने लगते हैं। वास्तविक ज्ञान वह है, जो आचरण में उतरे। ज्ञान का प्रदर्शन अंततः दुःख का कारण बनता है। यदि ज्ञान वास्तव में आत्मिक उन्नति का साधन है, तो वह विनम्रता और करुणा को जन्म देता है, न कि अहंकार को। आत्मा और परमात्मा के बीच सबसे बड़ी दीवार अहंकार है। जब तक यह दीवार खड़ी है, तब तक आत्मानुभूति संभव नहीं है। महात्मा कबीर का प्रसिद्ध कथन, जब मैं था तब हरि नहीं, जब हरि है मैं नाहिं, इसी सत्य को प्रकट करता है। ‘मैं’ का मिथ्या बोध ही अहंकार है। जिस दिन यह ‘मैं’ मिट जाता है, उसी दिन भीतर परमात्मा का प्रकाश प्रकट होने लगता है। अहंकार के शून्य होने की अवस्था ही वास्तविक पूर्णता की अवस्था है। आज के प्रतिस्पर्धात्मक युग में अहंकार को सफलता का पर्याय समझ लिया गया है, जबकि वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। विनम्रता, सहिष्णुता और सरलता ही दीर्घकालीन सफलता की कुंजी हैं। अहंकार तात्कालिक ऊँचाई तो दे सकता है, लेकिन स्थायित्व नहीं दे सकता। जीवन-विकास का सच्चा मार्ग उसी के लिए खुलता है, जो अपने भीतर के ‘मैं’ को नियंत्रित कर सके। अहंकार का त्याग कोई कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी शक्ति है। जो इसे समझ लेता है, वही जीवन की वास्तविक ऊँचाइयों को छूता है। ईएमएस/21/010/2026