लदन (ईएमएस)। शिक्षा के क्षेत्र में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी अब अपनी बादशाहत खोती जा रही है। हाल ही में जारी हुई वैश्विक विश्वविद्यालय रैंकिंग में न केवल हार्वर्ड, बल्कि कई अन्य प्रतिष्ठित अमेरिकी विश्वविद्यालयों की रैंकिंग में भी गिरावट दर्ज की गई है! वहीं चीन के प्रमुख विश्वविद्यालयों ने उल्लेखनीय उछाल के साथ वैश्विक मंच पर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई है। लगातार कई वर्षों तक नंबर-1 स्थान पर काबिज रहने के बाद हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की रैंकिंग में आई गिरावट ने शिक्षा विशेषज्ञों को हैरान कर दिया है। रैंकिंग के मानकों में रिसर्च पेपर की गुणवत्ता, अंतरराष्ट्रीय छात्रों का अनुपात, फैकल्टी का अकादमिक योगदान और वैश्विक प्रभाव जैसे प्रमुख पैमाने शामिल हैं। इन सभी पहलुओं पर हार्वर्ड का स्कोर पहले की तुलना में कमजोर हुआ है। यह पहली बार है जब टॉप संस्थानों की सूची में हार्वर्ड को इतनी कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा है कि उसकी वर्षों पुरानी बादशाहत पर सवाल खड़े हो गए हैं। इस बीच चीन के विश्वविद्यालयों ने वैश्विक शिक्षा परिदृश्य में नई ताकत के रूप में खुद को स्थापित किया है। सिंघुआ यूनिवर्सिटी और पेकिंग यूनिवर्सिटी जैसे संस्थानों ने रैंकिंग में लंबी छलांग लगाई है। चीनी सरकार द्वारा लागू किए गए ‘डबल फर्स्ट क्लास यूनिवर्सिटी प्लान’ के तहत उच्च शिक्षा और शोध में अरबों डॉलर का निवेश किया गया है। इसका सीधा असर रिसर्च आउटपुट और इनोवेशन पर देखने को मिल रहा है। खासतौर पर एसटीईएम यानी विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित के क्षेत्रों में चीनी विश्वविद्यालयों के शोध पत्र अब अमेरिकी संस्थानों की तुलना में अधिक बार उद्धृत किए जा रहे हैं, जिससे उनकी वैश्विक साख लगातार मजबूत हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी विश्वविद्यालयों की गिरती रैंकिंग के पीछे वहां की नीतिगत परिस्थितियां भी एक बड़ा कारण हैं। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के दौरान शिक्षा और रिसर्च बजट में कटौती को लेकर जो संकेत मिले, उन्होंने अमेरिकी उच्च शिक्षा प्रणाली को झटका दिया। इसके साथ ही विदेशी छात्रों, विशेष रूप से चीनी शोधकर्ताओं के लिए सख्त वीजा नियमों ने भी अमेरिकी कैंपस के अंतरराष्ट्रीय माहौल को प्रभावित किया है। जब फंडिंग और वैश्विक प्रतिभा दोनों पर असर पड़ता है, तो इसका सीधा प्रभाव शोध की गुणवत्ता और संस्थानों की रैंकिंग पर दिखना स्वाभाविक है। शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव किसी एक साल की रैंकिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक शिक्षा व्यवस्था में बड़े और दीर्घकालिक बदलाव का संकेत हो सकता है। यदि अमेरिका में उच्च शिक्षा के लिए वित्तीय समर्थन और अकादमिक स्वतंत्रता पर इसी तरह दबाव बना रहा, तो आने वाले वर्षों में वैश्विक टॉप विश्वविद्यालयों की सूची में एशियाई देशों का वर्चस्व बढ़ सकता है। सुदामा/ईएमएस 21 जनवरी 2026