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26-Jan-2026
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नई दिल्ली (ईएमएस)। 77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर देश ने कर्तव्य पथ पर एक अनोखा और ऐतिहासिक दृश्य देखा, जब भारतीय सेना की रिमाउंट एंड वेटरनरी कोर (आरवीसी) की विशेष रूप से तैयार की गई पशु टुकड़ी ने राष्ट्रीय परेड में कदमताल की। यह पहली बार था जब गणतंत्र दिवस परेड में पशुओं ने औपचारिक मार्च किया। इस प्रस्तुति के जरिए भारतीय सेना ने यह संदेश दिया कि देश की सीमाओं की सुरक्षा में पशुओं की भूमिका आज भी उतनी ही अहम है, जितनी आधुनिक तकनीक की। इस विशेष टुकड़ी में दो बैक्ट्रियन ऊंट, चार जांस्कर टट्टू, चार प्रशिक्षित शिकारी पक्षी यानी रैप्टर्स, दस स्वदेशी नस्ल के आर्मी डॉग और वर्तमान में सेवा में तैनात छह पारंपरिक सैन्य कुत्ते शामिल थे। मार्च की अगुवाई मजबूत और सहनशील बैक्ट्रियन ऊंटों ने की, जिन्हें हाल ही में लद्दाख के ठंडे रेगिस्तानी क्षेत्रों में ऑपरेशनों के लिए शामिल किया गया है। अत्यधिक ठंड, कम ऑक्सीजन और 15 हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर काम करने के लिए स्वाभाविक रूप से अनुकूल ये ऊंट बेहद कम पानी और भोजन में 250 किलोग्राम तक भार ढोने में सक्षम हैं। इनके शामिल होने से वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास रेतीले इलाकों और खड़ी ढलानों में सेना की गश्त और रसद क्षमता को मजबूती मिली है। ऊंटों के साथ लद्दाख की दुर्लभ देशी नस्ल के जांस्कर टट्टू भी मार्च करते नजर आए। आकार में छोटे होने के बावजूद ये टट्टू असाधारण सहनशक्ति के लिए जाने जाते हैं। ये शून्य से 40 डिग्री सेल्सियस तक नीचे तापमान और 15 हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर 40 से 60 किलोग्राम तक भार लंबी दूरी तक ले जा सकते हैं। वर्ष 2020 में सेना में शामिल किए गए ये टट्टू सियाचिन ग्लेशियर जैसे अत्यंत कठिन इलाकों में तैनात हैं। परेड में शामिल चार रैप्टर्स ने पक्षी हमलों की रोकथाम और निगरानी जैसी जिम्मेदारियों में उनकी उपयोगिता को दर्शाया। इनके जरिए संवेदनशील इलाकों में प्राकृतिक क्षमताओं के अभिनव इस्तेमाल को सामने रखा गया। परेड का सबसे भावनात्मक और आकर्षक दृश्य सेना के कुत्तों की मौजूदगी रही, जिन्हें ‘मूक योद्धा’ कहा जाता है। मेरठ स्थित आरवीसी सेंटर में प्रशिक्षित ये कुत्ते आतंकवाद विरोधी अभियानों, विस्फोटक और बारूदी सुरंगों का पता लगाने, ट्रैकिंग, सुरक्षा, आपदा राहत और खोज एवं बचाव कार्यों में अहम भूमिका निभाते हैं। आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया की सोच के अनुरूप सेना ने मुधोल हाउंड, रामपुर हाउंड, चिप्पीपराई, कोम्बाई और राजपलायम जैसी स्वदेशी कुत्तों की नस्लों को तेजी से शामिल किया है। यह परेड न केवल सैन्य परंपराओं का प्रदर्शन थी, बल्कि उन मूक साथियों को सम्मान देने का प्रतीक भी, जो हर परिस्थिति में सैनिकों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर देश की सेवा करते हैं। डेविड/ईएमएस 26 जनवरी 2026