लेख
27-Jan-2026
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भारत में न्याय पालिका को संविधान ने सर्वोच्च स्थान पर रखा है। विधायिका और कार्यपालिका के कार्यों की समीक्षा तथा अंतिम फैसला करने का अधिकार संविधान ने न्यायपालिका को दिया है। अब ऐसा ऐसा लगने लगा है, न्यायपालिका सरकार के अधीन है। सरकार के दबाव में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज फैसला करने के लिए बाध्य हैं। यदि जज सरकार की अनुकूलता के अनुसार फैसला नहीं देते हैं, तो पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से जजों के ट्रांसफर किए जा रहे हैं, जिस तरह से उनकी वरिष्ठता क्रम को नजर अंदाज करते हुए, उनकी नियुक्तियां की जा रही हैं। उसको लेकर अब विरोध खुलकर सामने आने लगा है। न्यायपालिका की कॉलेजियम व्यवस्था, हाईकोर्ट ऒर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर सवालिया निशान लगना शुरू हो गए हैं। यह स्थिति भारतीय संविधान, लोकतंत्र और न्यायपालिका के अस्तित्व पर बहुत बड़ा सवाल खड़ा करने लगी है। कॉलेजियम की अनुशंसा पर सरकार का विधि मंत्रालय ट्रांसफर आदेश जारी करता है। कॉलेजियम की अनुशंसा में यह उल्लेख होने लगा है, यह अनुशंसा सरकार के अनुरोध पर की गई है। जो अपने आप कॉलेजियम की अधिकारिता को दर्शा रही है। सुप्रीम कोर्ट के जज उज्ज्वल भुइयाँ ने सार्वजनिक रूप से न्यायपालिका के ऊपर कार्यपालिका के प्रभाव को स्वीकार किया है। जजों की नियुक्ति, ट्रांसफर और पोस्टिंग में जिस तरह का हस्तक्षेप सरकार द्वारा किया जा रहा है, उदाहरण स्वरुप हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में एक जज की नियुक्ति हुई है। उस नियुक्ति में 56 जजों की वरिष्ठता को नजर अंदाज किया गया। इसके बाद न्यायपालिका में खदर-बदर मची हुई है। सुप्रीम कोर्ट में जूनियर जजों को महत्वपूर्ण मामले दिए जा रहे हैं। सीनियर जजों को कम महत्व के मामले दिए जाते हैं। न्यायपालिका में जिस तरीके से न्याय हो रहा है, उस पर बड़ा प्रश्न चिन्ह लगने लगा है। हाल ही में कई जजों के ऐसे ट्रांसफर किए गए हैं, जो उनके फैसलों के कारण हुए हैं। दिल्ली दंगे के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट के एक जज ने हेट स्पीच को लेकर एक फैसला दिया था। फैसला देने के तुरंत बाद रातों-रात उस जज का ट्रांसफर कर दिया गया। हाल ही में न्यायमूर्ति श्रीधरन का ट्रांसफर सरकार के अनुरोध पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में किया गया। उन्होंने मध्य प्रदेश शासन के मंत्री विजय शाह द्वारा एक महिला सेवा अधिकारी पर आपत्तिजनक टिप्पणी को संज्ञान मे लिया था। हेट स्पीच को लेकर दमोह के एक मामले में कार्यवाही की थी। नर्सिंग कॉलेजों में जो घोटाला हो रहा था, इसकी सीबीआई जांच के आदेश दिए थे। इसी तरह पैरामेडिकल कॉलेज जो बिना किसी मान्यता के चल रहे थे, उन पर रोक लगाई थी। सरकार उनके फेसलों से नाराज थी। कॉलेजियम ने उनका ट्रांसफर छत्तीसगढ़ करने की अनुशंसा की थी। बाद में सरकार के हस्तक्षेप से उन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट भेजा गया। जहां पर उनकी वरिष्ठता खत्म हो गई। अब वह चीफ जस्टिस नही बन पाएंगे। ना सुप्रीम कोर्ट जा पाएंगे। जबकि छत्तीसगढ़ की वरिष्ठता के आधार पर वह सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच सकते थे। इस तरह के एक नही बहुत सारे मामले, पिछले कुछ वर्षों में देखने को मिले हैं। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जिन जजों ने सरकार के पक्ष में फैसला नहीं दिया, उन जजों को प्रताड़ित करने का काम कॉलेजियम के माध्यम से सरकार द्वारा किया गया है। जिसके कारण न्यायपालिका की साख आम आदमी की नजरों में कम होती चली जा रही है। इस बात का उल्लेख कोई और नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान जज भुइयां ने सार्वजनिक कार्यक्रम में किया है। जजों की नियुक्ति, ट्रांसफर और पोस्टिंग में कार्यपालिका द्वारा जिस तरह का दबाव कॉलेजियम और जजों के ऊपर बनाया जा रहा है। उनका कहना था, न्यायिक तबादले केवल न्याय के बेहतर प्रशासन के लिए होने चाहिए। अब ट्रांसफर, पोस्टिंग कार्य पालिका के दबाव में सजा के रूप में की जा रही है। इस दखल को उन्होंने गंभीर चिंता का विषय बताया है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा है, एक बार न्यायपालिका की विश्वसनीयता खत्म हो गई, तो संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था को बनाए रखना किसी के वश में नहीं होगा। सारे देश के हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज जिस तरह से सरकार के दबाव में काम करते हुए नजर आ रहे हैं, उसके बाद न्याय पालिका के ऊपर लोगों का विश्वास खत्म होता जा रहा है। खुलकर न्यायपालिका की आलोचना होने लगी है। अब न्यायालय में जाने के स्थान पर आम लोग राजनेताओं और गुंडे बदमाशों का सहारा लेने लगे हैं। आम आदमी सार्वजनिक स्थलों पर अपना विरोध दर्ज कराने लगे हैं। अभी यह प्रारंभिक स्तर पर है। न्यायपालिका की विश्वसनीयता, निष्पक्षता तथा संविधान के अनुसार फैसला नहीं होने पर जनता का विश्वास न्यायपालिका पर नहीं रहेगा। ऐसी स्थिति में भीड़ तंत्र स्वयं आकर न्याय करने लगता है। इसको राजनीतिक दलों, न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका को समझना होगा। हाल ही के वर्षों में श्रीलंका, बांग्ला देश, नेपाल और दुनिया के अन्य लोकतांत्रिक देशों में, जहां न्यायपालिका कमजोर हुई है, सरकारों की दखलंदाजी बढ़ी है। वहां पर भीड़तंत्र ने न्याय पाने के लिए स्वयं अपना रास्ता चुन लिया, जो अत्यंत खतरनाक है। न्यायपालिका की जिम्मेदारी है- जजों की नियुक्ति, उनके ट्रांसफर-पोस्टिंग में पारिदर्शिता हो। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट मे जो फैसले हो रहे हैं, समय-समय पर उनका मूल्यांकन होना भी जरूरी है। न्यायपालिका पर जिस तरह से भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं। सरकार और प्रशासन के साथ मिलीभगत के आरोप लग रहे हैं। न्यायपालिका पर बड़े-बड़े पूंजीपतियों के पक्ष में फैसला होने की बात सामने आ रही है। हाल ही में राजस्थान के एक जज का ट्रांसफर रातों-रात इसलिए कर दिया गया क्योंकि उन्होंने फैसले में देश के एक बहुत बड़े उद्योगपति की कंपनी पर 50 लाख रुपए का जुर्माना लगाया था। हाईकोर्ट से उस आदेश को तुरंत स्थगित कर दिया गया। जज साहब का भी ट्रांसफर कर दिया गया। इस तरह के संबंध होने की बात सामने आने लगी है। ऐसी स्थिति में न्यायपालिका पर लोगों का विश्वास बनाए रखने के लिए बेहद सजगता की जरूरत है। समय रहते उपचार नहीं किया गया, तो भविष्य में क्या होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। सत्ता पर अंकुश जरूरी है। यदि अंकुश महावत का नहीं होता है तो मदमस्त हाथी अपनी ताकत के बल पर विनाश ही करता है। ईएमएस / 27 जनवरी 26