देश की धड़कन संसद में,जनता की निगाहें वित्त मंत्री सीता रमण परकुछ ही घंटे शेष हैं।संसद के भीतर केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का बजट भाषण तैयार है और संसद के बाहर पूरा देश सांस रोके बैठा है।1 फरवरी 2026 को पेश होने वाला आम बजट केवल सरकारी खाते-बही का दस्तावेज नहीं,बल्कि करोड़ों नागरिकों की उम्मीदों,आशंकाओं और अपेक्षाओं की कसौटी है।यह वही घड़ी है जब तय होगा कि आर्थिक सर्वेक्षण में खींची गई तस्वीर को वित्त मंत्री कितनी मजबूती देती हैं और क्या यह बजट सचमुच जनता के जीवन में राहत की बारिश करेगा या फिर आंकड़ों की चकाचौंध में आम आदमी को एक बार फिर खाली हाथ लौटना पड़ेगा।आर्थिक सर्वेक्षण ने तस्वीर रख दी,अब बजट जवाब देगा।आर्थिक सर्वेक्षण ने एक तरफ भारत की मजबूत जीडीपी ग्रोथ,नियंत्रित महंगाई और वैश्विक अस्थिरता के बीच देश की स्थिरता को रेखांकित किया है।वित्त मंत्री ने स्वयं कहा है कि भारत दुनिया के लिए “ग्लोबल ब्राइट स्पॉट” है। 2025-26 में 7.4 प्रतिशत विकास दर का अनुमान भारत को लगातार चौथे वर्ष सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बनाता है।लेकिन सवाल यह है - क्या यह चमक आम आदमी के घर तक पहुंची है? क्या विकास के ये आंकड़े किसान की खेत-मेड़ पर,मजदूर की थाली में और युवा की नौकरी में बदल पाए हैं?अर्थव्यवस्था की तस्वीर जितनी उजली है,चुनौतियां उतनी ही गहरी हैं। रोजगार,ग्रामीण मांग,राज कोषीय घाटा और महंगाई—ये ऐसे मोर्चे हैं जहां सिर्फ भाषण नहीं, ठोस फैसले चाहिए।आम आदमी: हर बजट में सबसे बड़ा दर्शक,सबसे बड़ा पीड़ित हर वर्ष बजट आता है और हर वर्ष आम आदमी वही सवाल पूछता है—“इस बार मेरे लिए क्या?” महंगाई ने ग्रृहणी की रसोई को जकड़ रखा है।शिक्षा और स्वास्थ्य खर्च लगातार बढ़ रहा है।मध्यम वर्ग टैक्स के बोझ से दबा है।गरीब कल्याण योजनाओं पर निर्भर है।आम बजट का असली मतलब तभी होगा जब यह आम आदमी के जीवन में राहत लाएगा।वरना यह “आम बजट” नहीं, सिर्फ सरकारी औपचारिकता बनकर रह जाएगा।मध्यम वर्ग: टैक्स राहत नहीं मिली तो नाराजगी तय है।मध्यम वर्ग इस बजट की सबसे बड़ी उम्मीद है और सबसे बड़ा दबाव भी।इस वर्ग को इनकम टैक्स में राहत,स्लैब में बदलाव, स्टैंडर्ड डिडक्शन बढ़ाने और होम लोन ब्याज छूट की सीमा बढ़ने की आस है। ऐसे मे क्या सरकार इस वर्ग को राहत देगी या फिर एक बार फिर “धैर्य रखिए” कहकर टाल देगी? दिलचस्प बात यह है कि गूगल ट्रेंड्स बताता है कि बजट के दिनों में “इनकम टैक्स” से ज्यादा “बजट” शब्द सर्च होता है।यानी जनता सिर्फ टैक्स नहीं, पूरे भविष्य का जवाब चाहती है।किसान: सम्मान निधि बढ़ेगी या सिर्फ आश्वासन मिलेगा? -देश का किसान इस बजट की सबसे बड़ी निगाह है। उम्मीद की जा रही है कि पीएम किसान सम्मान निधि की राशि 6,000 से बढ़ाकर 12,000 रुपये की जा सकती है।सरकार बताती है कि 11 करोड़ किसानों को अब तक 4.09 लाख करोड़ रुपये दिए जा चुके हैं। लेकिन सवाल यह है—क्या यह पर्याप्त है? किसान आज भी खाद-बीज की कीमतों, सिंचाई की कमी और एमएसपी की अनिश्चितता से जूझ रहा है। यदि बजट किसान को केवल योजनाओं के आंकड़े देगा,तो यह राहत नहीं,छलावा कहलाएगा। महिलाएं: लाभार्थी नहीं,भागीदार बनें -महिलाओं को उम्मीद है कि उज्ज्वला जैसी योजनाओं का विस्तार होगा, महिला उद्यमियों को सस्ते लोन मिलेंगे और कामकाजी महिलाओं के लिए टैक्स में विशेष छूट आएगी।यहाँ पर सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या बजट महिलाओं को केवल लाभार्थी बनाएगा या आर्थिक विकास की असली भागीदार?यदि महिला सशक्तिकरण सिर्फ घोषणाओं तक सीमित रहा, तो यह भी उपेक्षा का ही दूसरा नाम होगा।युवा: रोजगार चाहिए,भाषण नहीं देश का युवा आज सबसे बड़ा प्रश्न है।स्टार्टअप्स,स्किल डेवलपमेंट,शिक्षा ऋण में राहत और रोजगार सृजन—यही उनकी अपेक्षा है।लेकिन युवा को अब “भविष्य उज्ज्वल है” जैसे वाक्य नहीं चाहिए।उसे नौकरी चाहिए,अवसर चाहिए,स्थिरता चाहिए।अगर बजट रोजगार के मोर्चे पर ठोस कदम नहीं उठाता, तो विकास दर के सारे आंकड़े खोखले साबित होंगे।कर्मचारी और पेंशनर्स: 8वें वेतन आयोग का इंतजार -सरकारी कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए बजट भाषण बेहद महत्वपूर्ण है।8वें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिए यदि बजट में फंड का प्रावधान हुआ,तो उम्मीदें पंख पकड़ेंगी।वरना यह वर्ग भी खुद को उपेक्षित महसूस करेगा।बाजार और निवेशक: बजट का असर सिर्फ शेयर नहीं,भरोसे पर भी बजट से पहले सोने-चांदी में भारी गिरावट बाजार की बेचैनी का संकेत है।निवेशकों के लिए बजट अनिश्चितता और अवसर दोनों है। एसबीआई सिक्योरिटीज की रिपोर्ट बताती है कि बजट के बाद बाजार में 70 प्रतिशत से ज्यादा बार रिकवरी देखी गई है।बाजार का असली आधार भरोसा है, और भरोसा तभी टिकेगा जब बजट में स्थिरता और स्पष्ट दिशा होगी। बजट 2026: बड़ा धमाका या धीमी रणनीति? -एमके ग्लोबल ने इसे “लो-इम्पैक्ट इवेंट” कहा है। बड़े सुधार पहले ही हो चुके हैं, इसलिए नई घोषणाओं की गुंजाइश सीमित है।जनता को “गुंजाइश” नहीं चाहिए,उसे राहत चाहिए।उसे भरोसा चाहिए कि सरकार विकास को जमीन पर उतारेगी।संक्षेप हम कह सकते है कि यह बजट जनता की झोली भरेगा या उम्मीदें फिर टाल देगा?देश की स्थिति उस किसान जैसी है जो आसमान की ओर देख रहा है—बारिश होगी या नहीं।आम बजट 2026 से अपेक्षा है कि जीवन सस्ता हो रोजगार बढ़े, किसान मजबूत हो, महिलाएं सशक्त हों और मध्यम वर्ग को राहत मिले,लेकिन अगर यह बजट सिर्फ आंकड़ों और योजनाओं का दस्तावेज बनकर रह गया,तो यह “आम बजट” नहीं, “उपेक्षा बजट” कहलाएगा।अब फैसला संसद में होगा। कुछ ही घंटों में तय हो जाएगा कि यह बजट जनता की उम्मीदों का पर्व बनता है या एक और अधूरी कहानी। ईएमएस/31/01/2026