बिलासपुर (ईएमएस)। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने आवश्यक पक्षकार को याचिका में शामिल नहीं करने को गंभीर त्रुटि मानते हुए एक आपराधिक रिट याचिका को खारिज कर दिया है। हालांकि, न्यायालय ने याचिकाकर्ता को कानून के अनुसार पुन: नई याचिका दायर करने की स्वतंत्रता प्रदान की है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा एवं न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने पंकज अग्रवाल बनाम राज्य शासन एवं अन्य में यह आदेश पारित किया है। क्या था मामला रायगढ़ निवासी पंकज अग्रवाल ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर यह मांग की थी कि वर्ष 1998 से लंबित प्रकरण क्रमांक 257/1998 का निराकरण शीघ्र किया जाए। इसके साथ ही याचिकाकर्ता ने एसडीएम रायगढ़ द्वारा जब्त की गई संपत्ति को मुक्त कर उसका कब्जा सौंपने तथा जब्त संपत्ति की कथित बिक्री की जांच कराने का भी आग्रह किया था। सुनवाई के दौरान उठी गंभीर आपत्ति याचिका की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पाया कि जिस शिकायत के आधार पर संबंधित प्रकरण लंबित है, उस शिकायतकर्ता आकाशदीप को याचिका में पक्षकार नहीं बनाया गया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता इस मामले में आवश्यक एवं उचित पक्षकार है और उसके बिना मामले का प्रभावी व पूर्ण निराकरण संभव नहीं है। खंडपीठ ने कहा कि आवश्यक पक्षकार को शामिल न करना याचिका को विधिक रूप से दोषपूर्ण बनाता है। लागत के साथ याचिका खारिज इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर 10,000 रुपये की लागत अधिरोपित की। न्यायालय ने निर्देश दिए कि यह राशि एक सप्ताह के भीतर हाईकोर्ट की रजिस्ट्री में जमा की जाए। जमा की गई राशि को बाद में सरकारी दृष्टि एवं श्रवण बाधित विद्यालय तिफरा, जिला बिलासपुर को प्रेषित किया जाएगा। पुन: याचिका दायर करने की छूट न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिका की यह खारिजी याचिकाकर्ता के अधिकारों पर स्थायी रोक नहीं है। याचिकाकर्ता को स्वतंत्रता दी गई है कि वह शिकायतकर्ता को विधिवत पक्षकार बनाकर उसी कारण के आधार पर नई याचिका दायर कर सकता है। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि याचिका के साथ संलग्न प्रमाणित दस्तावेजों की फोटोकॉपी रिकॉर्ड में सुरक्षित रखकर मूल प्रमाणित प्रतियां याचिकाकर्ता के अधिवक्ता को लागत जमा किए जाने के बाद लौटा दी जाएं। मनोज राज/योगेश विश्वकर्मा 01 फरवरी 2026