लेख
03-Feb-2026
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आज छात्रों को हिंदी विज्ञान में कार्य करने के लिए वैज्ञानिक कार्यों का करना राजभाषा के लिए शुभ है विज्ञान संचार को हम यूं समझ सकते है, जैसे कि वैज्ञानिक जानकारियों जहां से पैदा हो रही हैं। वहां से लेकर उन जानकारियों के प्रयोग करने वालों तक पहुंचाना। इसके लिए विभिन्न प्रकार के माध्यम अपनाए जाते हैं। विज्ञान संचार को दो भागों में बांटा जा सकता है। पहला शोधपरक विज्ञान संचार और दूसरा लोकप्रिय विज्ञान संचार। लैब में होने वाले शोधों की जानकारी तकनीकी भाषा में होती है। इसे आम आदमी सुगमता से नहीं समझ सकता। लोकप्रिय विज्ञान संचार में यह परेशानी आती है कि विज्ञान की कठिन बातों को सरल कैसे बनाया जाए और आम लोगों तक पहुंचाया जाए। सबसे बड़ी समस्या यह है कि रिसर्च पेपर की भाषा को आम लोग समझ नहीं पाते और वैज्ञानिक आम जन की भाषा को नहीं समझ पाते। यहीं पर परेशानियां पैदा होती हैं। वास्तव में विज्ञान के जटिल तर्कों को सरल भाषा में जो भी आम लोगों तक पहुंचा देगा वही एक सफल विज्ञान संचारक कहलाएगा। वास्तव में विज्ञान संचार के दो प्रमुख उद्देश्य हैं-विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की जानकारी आम जन तक पहुंचाना और उनमें वैज्ञानिक-तकनीकी दृष्टिकोण का विकास करना। किसी भी व्यक्ति में जब वैज्ञानिक दृष्टिकोण समाहित होने की बात की जाए तो इसका अर्थ यह होगा कि उसमें सोच, आचरण, व्यवहार और निर्णय लेने के स्तरों पर वैज्ञानिकता की छाप अवश्य दिखे।इसी छाप को अखिल भारतीय स्तर पर बनाये रखने के लिए हिंदी विज्ञान साहित्य परिषद, मुंबई द्वारा पिछले 57 वर्ष से लगातार विज्ञान संचार किया जा रहा जिसमें किसी परिषद के पूर्व निष्ठावान विद्वान द्वारा हिंदी विज्ञान में एक नई क्रांति मुंबई के वैज्ञानिकों ने 1968 में भारतीय वैज्ञानिक द्वारा हिंदी विज्ञान साहित्य परिषद की नींव मुंबई में रखी और 2साल बाद वैज्ञानिक पत्रिका का सतत प्रकाशन हुआ जो आज भी ऑनलाइन माध्यम से चल रही है। अतः राष्ट्रीय अस्तर पर हिंदी विज्ञान साहित्य परिषद ही एक मात्र ऐसी संस्था बची जो विज्ञान संचार हेतु 1 वर्ष में 4 अंक का नियमित प्रकाशन कर रही है जिसके वर्तमान संपादक श्री ब्रजेश कुमार सिन्हा हैं एक अनाधिकृत संस्थान भी वैज्ञानिक का डुप्लीकेट कॉपी निकाल रही है जो पोथी पर ऑनलाइन विक्रय किया जा रहा वह नकली है बता दें वैज्ञानिक पत्रिका हिंदी विज्ञान साहित्य परिषद के आजीवन सदस्यों को मुफ्त में दिया जाता है और विज्ञान को हिंदी में प्रसार हेतु यह अंक पूर्णतः निशुल्क है.वैज्ञानिक का अगला अंक जनवरी -मार्च 26 सांख्यिकीय विशेष अंक होगा अतः विज्ञान व गणित के छात्रों से अनुरोध है कि कृप्या10दिनों के अंदर परिषद के ईमेल पर अपना आलेख व परिचय के साथ समय के अंदर आलेख भेज सकते हैं.इनोवेशन के लिए साइंस कम्युनिकेशन या विज्ञान संचार सबसे ज़रूरी है आज देश को विज्ञान की सही जानकारी हेतु विज्ञान संचार बहुत जरुरी है, यदि आप बेरोजगार हैं, तो इन वास्तविकताओं का सामना करने से आप अक्सर अभिभूत, उदास और निराश महसूस कर सकते हैं। वैश्विक महामारी के लिए ये वैध प्रतिक्रियाएं हैं, लेकिन साइंस कम्युनिकेशन सकारात्मक बने रहें इसके लिए वैज्ञानिक लेखन को गतिशील बनाने की जरुरत है ताकि हमारे भारत में हिंदी में विज्ञान का कर सकें.वैज्ञानिक (त्रैमासिक) -प्रतियोगिता विशेषांक में में विशेष-विषय जैसे चिकित्सा के क्षेत्र में डेंगू, थैलेसीमिया पशु में कैंसर, ई खेती, ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत, कल्पना चावला की जीवनी आदि लेख वैज्ञानिक ज्ञान से भरा , समसामयिक और रोचक रहा है , ‘वैज्ञानिक’ के संपादन एवं व्यवस्थापन से जुड़े सभी विज्ञान प्रेमियों द्वारा लेखन जगत की परिवृद्धि के लिए ऐसे प्रयास सराहनीय हैं। हिन्दी विज्ञान की लोकप्रिय पत्रिका वैज्ञानिक से जुड़े सभी विज्ञान लेखकों पाठकों और सृजनशील व्यक्तियों के निरंतर सहयोग, स्नेह, विश्वास और वैज्ञानिक से लगाव है। इसके मुख्य संपादक श्री ब्रजेश कुमार सिन्हा हैं व संपादकीय बोर्ड के सदस्य सर्वश्री, राजेश कुमार मिश्र,राजेश कुमार, केके वर्मा, डॉ संजय कुमार पाठक व वैज्ञानिक के व्यवस्थापक ,सर्वश्री श्री नवीन त्रिपाठी, बी.एन. मिश्र,अनिल अहिरवार, प्रकाश कश्यप, बधाई श्री राज़ कुमार डाबरा बधाई के पात्र हैँ.विज्ञान साहित्य का ऐसा मिला-जुला ढंग उस साहित्य के सृजन में सहायक होता है जो पूर्णत: भौतिकवादी होता है तथा शुद्ध कला का निर्माण नहीं करता है.हिंदी विज्ञान की पत्रिका वैज्ञानिक का योगदान विज्ञान संचार हेतु जरुरी है ताकि इससे नवविज्ञान लेखकों क़ो एक वैज्ञानिक मंच मिल सके। (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 3 फरवरी /2026