लेख
04-Feb-2026
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आज मोबाइल के युग में मन में अशांति रहती है हमारी ऑंखें प्रतिपल संसार में पूर्णता खोज रही हैं यही कारण है कि मन इतना अशांत रहता है, जब तक मन उस एक को नहीं पा लेगा जिसकी उम्मीद वो संसार से रखता है तब तक अशांति बनी रहेगी,अशांति तो मन में ही होती और उसी को जागरूक करना होता है और मन शांत हो जाए तो आन्तरिक शांति आ जाती है। फिर भी अशांत व्यक्ति के लिए कहने में तो यही आता है कि रेस्ट लेस बॉडी है। यह सही है क्योंकि राम का नाम को बोलने से हमारी स्टेटिक एनर्जी और डायनामिक एनर्जी दोनों सक्रिय होते हैं उसके पश्चात आप भगवान राम को जब जोड़ देते हैं तो आप अपनी ऊर्जा को स्टैटिक ऊर्जा की ओर एक प्रकार से बढ़ाने का प्रयास करते हैं जो स्थायित्व देता है। और ह्रदय में यह गूंज स्वाभाविक है। क्योंकि यह राम नाम का तरंग की ऊर्जा आपके पूरे शरीर को आंदोलन करती है और हमारा मस्तिष्क ध्यान करने पर अपनी सुग्रहता को बढ़ा देता है जिस कारण हमको यह गूंज वहां सुनाई देती है। इस मानव के शरीर में तो प्रभु राम ने बहुत कृपा की है। बॉडी के अंदर रिपेयर सिस्टम है साधारणतय यह कृपा बड़े बड़ों के ऊपर नहीं की जाती है। इसकी अनुभूति बार-बार होती है भगवान राम का ध्यान करने से अब चाहे कोई द्वैत बोले अद्वैत बोले कोई भी बोले वह सब तर्क वितर्क की बातें हैं लेकिन जहां अनुभूति की बात होती है बहुत से लोग मन की चाल बाजियां कह सकते हैं, कहते रहे लेकिन जो प्रभु राम की लीला की कृपा होती है उस पर मैं बार-बार बलिहारी होता हूं। जिस तरीके से प्रश्न को और जिज्ञासा को समझाया जाता है वह वैज्ञानिक आधार पर खराब उतरता है और स्वयं मुझे संतुष्ट करता है यह केवल और केवल प्रभु की कृपा ही है अब ज्ञानी जान भले ही कुछ भी भाषण देते रहे बोलते रहे समझाते रहे, चमत्कार दिखाते रहे लेकिन उनको समझने का मन नहीं करता है क्योंकि जब ईश्वर राम स्वयं समझाता है अंदर से बोली आती है तो मन धन्य हो जाता है। मन द्रवित हो जाता है प्रभु की कृपा देखकर जिस तरह के गुण संस्कार उसके उसके माता पिता समाज से मिलते हैं वह उसी गुण को धारण करता है और वही वर्ण बन जाता है संस्कृत धातु भज् (bhaj) का मुख्य अर्थ सेवा करना, पूजा करना, आराधना करना या भक्ति करना है, जिससे भक्ति और भजन शब्द बने हैं।जो भी भगवान राम की भक्ति करता है उसमें सेवा का भाव आता है जो भक्ति का ही अंग है । सेवा एक बहुत सुंदर आराधना का रूप है । भजन जिसमें प्रभु राम का स्मरण करते हैं। सेवा कर्मों से प्रभु का स्मरण है । कौन हिस्सा होगा यह जिनकी योजना है वहीं चयन करते हैं। लीला रचाते हैं। हिस्सा बनना है तो उनकी (भगवान राम की) शरण में जाओ। प्रार्थना करो। शरणागति सुदृढ़ बनाओ। जीव दशा से मुक्त होने का प्रयास बढ़ाओ। हम सब हिस्सा ही हैं इस सृष्टि में जितने भी मनुष्य हैं सबको काम सौंपे हैं आप देख नहीं रहे किसान, मजदूर,पत्रकार ,शिक्षक सबको काम मिला है कि नहीं संसार का हिस्सा सब है। महाभारत में दुर्योधन आदि भी हिस्सा ही थे। लेकिन स्तर अलग अलग हो सकते हैं। भीड़ का हिस्सा मत बनो। भगवान राम के युग कार्य का हिस्सा बनो। उनके यंत्र बनो। : ईश्वर के यंत्र ही हम सब वो अलग बात है कि किसी को पता रहता है किसी को नहीं किसी पंखे को भान रहता है कि मुझे लाइट चला रही है और कोई समझता है मैं स्वयं चल रहा हूं विज्ञान की अपनी मर्यादा है विज्ञान पूछता है: “यह कैसे होता है?” विज्ञान: जाँचता है, प्रयोग करता है और प्रमाण मांगता है। लेकिन विज्ञान यह नहीं बताता: जीवन का अंतिम अर्थ क्या है। सही–गलत कैसे तय करें। भगवान राम की साधना मर्यादा का पालन करना है साधना सिखाती है: “मैं कौन हूँ? दुख क्यों है? शांति कैसे मिले?” लेकिन हर अनुभव हर व्यक्ति पर लागू नहीं होता। इसलिए आध्यात्म को “फुल-प्रूफ विज्ञान” बनाकर बेचना गलत है। जब तक भगवान राम के अर्थ को हम समझ नहीं पाते तब तक हम मौन और शांत रूप प्राप्त नहीं होंगे तब तक में कोई भी चर्चा निरर्थक कहीं जा सकती है। राम को पाना ही यही जीवन का अंतिम लक्ष्य है।गौतम ऋषि की पत्नी को इंद्र के छल के कारण गौतम ऋषि के श्राप से अहिल्या पत्थर बनी और भगवान राम के चरण स्पर्श से पुनः जीवित हो गईं एक मात्र ईश्वर भगवान राम है जो यह बताता है कि भगवान राम जे चरण स्पर्श मात्र से पत्थर जो निर्जीव है वो भी सजीव हो जायेगा कठोर कठोर चीज भी चरण स्पर्श मात्र से पिघल कर राम के भक्ति में लीन हो जायेगा। ईएमएस / 04 फरवरी 26