यह सच है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता ज्यादातर उत्तरप्रदेश से ही होकर निकलता है। यह भी सच है कि भले ही देश में नरेन्द्र मोदी को लेकर कोई विकल्प न हो लेकिन उनके उत्तराधिकारी के रूप में अघोषित रूप से योगी आदित्यनाथ का नाम सबसे पहले आता है। वहीं अक्सर सियासत में कहे.अनकहे ऐसे दांव.पेंच चले जाते हैं या हो जाते हैं जिससे आसान राहें भी मुश्किलें बढ़ाती नजर आने लगती हैं। फिलाहाल उत्तरप्रदेश में चुनावी सरगर्मी तो नहीं है लेकिन राजनीतिक सरगर्मी ने पहले पौष की कड़कड़ती ठण्ड और अब माघ की जाती ठण्ड में भी जबरदस्त और इतनी कि लू सरीखे सियासी तपन का अहसास जरूर करा दिया। दरअसलए उत्तराखंड के ज्योतिर्मठ के प्रमुख स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का 28 जनवरी को माघ मेला में स्नान किए बिना लौटना भले ही एक धार्मिक मामला हो। लेकिन वास्तव में सियासी ज्यादा रहा। नए वर्ष की शुरुआत में ही उत्तरप्रदेश में श्भगवा बनाम भगवाश् का मुद्दा जबरदस्त राजनीतिक और धार्मिक विमर्श का अहम मुद्दा रहा। लेकिन इसका यह आशय नहीं कि अब सब कुछ ठीक हो गया है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के स्नान और पालकी सहित जाने की जिद और प्रशासन के नहीं जाने देने से उत्पन्न विवाद इतना बड़ा तूल पकड़ेगाए इसका जनमानस को जरूर अंदाजा नहीं रहा। हाँए सियासतदारों को जरूर बैठेए बिठाए बड़ा मौका मिल गया। वास्तव में अविमुक्तेश्वरानंद अक्सर अपने बयानों को लेकर सुर्खियों में रहते हैं। वो किसी को भी नहीं छोड़ते ऐसी स्थिति में उनसे इस टकराहट को असाधारण माना जा रहा है। यदि वास्तव में प्रयागराज मेला प्रशासन चाहता तो इसे टाल सकता था लेकिन कहते हैं न कि राजनीति में लिए गए छोटे से छोटे फैसलों के दूरगामी परिणाम मतलब भरे होते हैं। हुआ भी वही। अब लोग भले ही यह कहें कि सरकार ने गलत किया या स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने। लेकिन सच तो यह है कि इसे प्रशासन की चूक या भूल भी कहना बेमानी होगा। एक ओर रूठे हुए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद धरने पर बैठ गए तो दूसरी ओर मुख्यमंत्री योगी ने शंकराचार्य विवाद के दौरान ही सीधे नाम न लेकरए सनातन धर्म की आड़ में राष्ट्रविरोधी या सनातन विरोधी एजेंडा चलाने वालों को श्कालनेमिश् कह दिया। जाहिर है इशारा अविमुक्तेश्वरानंद पर था। बाद में प्रयागराज में जो घटाए उसे देश ने देखा। बात असली और नकली शंकराचार्य तक जा पहुंची तो भला अविमुक्तेश्वरानंद कैसे चुप रहतेघ् उन्होंने भी सीधे.सीधे आदित्यनाथ से टकराने की रणनीति अपना ली। इस बीच प्रशासन ने शंकराचार्य को नोटिस पकड़ा दिया कि 18 जनवरी को त्रिवेणी संगम में जबरदस्ती घुसने के प्रयास से भगदड़ मच सकती थी। इतना ही नहीं यह तक पूछ लिया कि क्यों न उन्हें भविष्य के मेलों में भाग लेने से रोक दिया जाएघ् तल्खी और तब बढ़ी जब अगले नोटिस में मेला अधिकारियों ने 2022 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए शंकराचार्य की उपाधि पर ही सवाल उठाए विवाद को गहरा दिया। ऐसा देश ने पहली बार देखा। शह.मात के इस खेल में स्वामी अविमुक्तेश्वरनद ने अपने जवाब में उल्टा पूछ लिया कि ष्ना प्रशासनए ना उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्रीए और ना ही देश के राष्ट्रपति तय करेंगे कि कौन शंकराचार्य होघ् हालांकि शंकराचार्य पर आरोप लगे कि वो कांग्रेसी विचारधारा के हैं। लेकिन उन्होंने राहुल गांधी को भी नहीं छोड़ा। मामले ने तब और तूल पकड़ा जब समाजवादी पार्टी ने उनका समर्थन किया और कई बड़े नेताओं ने मुलाकात की। निश्चित रूप से वक्त के साथ शंकराचार्य विवाद राजनीतिक रूप ले चुका था। जिसमें कई मोड़ आए। एक ओर जहां पू्र्व केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने भी विश्वास व्यक्त किया कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी महाराज और उत्तरप्रदेश सरकार के बीच कोई सकारात्मक समाधान निकलेगा वहीं प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने उनसे स्नान करने की अपील की और कहा कि मैं ज्योतिष्पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के चरणों में प्रणाम करता हूंए उनसे प्रार्थना है कि वह स्नान कर इस विषय का समापन करें। लेकिन यह हो न सका। बस यहीं से जो मामला भगवा बनाम भगवा था उसे पार्टी लाइन की ओर भी समझा जाने लगा। उत्तरप्रदेश में भाजपा की गुटबाजी जगजाहिर है। यह तब और समझ में आई जब बीते महीने 30 जनवरी को महोबा विधायक में भाजपा विधायक बृजभूषण राजपूत और योगी कैबिनेट के मंत्री स्वतंत्र देव सिंह आपस में तकरार हो गई। मंत्री एक कार्यक्रम से लौट रहे थे कि दोपहर करीब साढ़े तीन बजे विधायक ने 100 ग्राम प्रधानों के साथ मिलकर उनका रास्ता रोक लिया और 100 गांवों में पानी न पहुंचने और पाइपलाइन के लिए खोदी गई सड़कों की मरम्मत न होने पर नाराजगी जताई। इसी तरह केशव प्रसाद मौर्य का बयान आना कोई सामान्य घटना नहीं है। बहरहाल इस पर भाजपा की ओर से कोई प्रतिक्रया नहीं आई लेकिन मौर्य का निवेदन हाईकमान का रुख माना जा रहा है तो ज़िला प्रशासन का ऐक्शन योगी सरकार का कदम। यकीनन ऐसी घटनाओं के पीछे बड़ी सियासत होगी जो आम लोगों की समझ से बाहर है। वैसे सबको पता है कि कैसी कवायद से योगी पहली बार मुख्यमंत्री बने थे। उसके बाद उनकी कार्यप्रणाली से उनका कद लगातार बड़ा होता चला गया। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने 28 जनवरी को दुखी मन से वाराणसी से विदा ली और बिना स्नान लौट गए। घटना को अकल्पनीय बताया। हालांकि संतों में भी दो परस्पर विरोधी गुट बन गए। वही अविमुक्तेश्वरानंद भी कमर कस के तैयार हैं। उन्होंने उत्तरप्रदेश में गाय को राजमाता का दर्जा दिलाने और गौ हत्या रोकने के लिए 40 दिनों की मोहलत दी जिस पर संत परमहंसाचार्य ने इसे राजनीति से प्रेरित बता कहा कि केवल गाय नहीं पूरा गौवंश ;बैलए बछड़ाए नंदीद्ध को राष्ट्रीय धरोहर घोषित हो तभी पूर्ण गौ.रक्षा संभव है। बहरहाल योगी आदित्यनाथ और शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की इस जुबानी जंग को लोग ऊंचे दर्जे की राजनीति से भी जोड़कर देख रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में कुछ इसे केन्द्र और राज्य के बीच का मसला समझते हैं तो कुछ इसे योगी आदित्यनाथ के बढ़ते कद से जोड़कर देख रहे हैं। बहरहाल ऐसी घटनाओं से अपने आप ही समझ आता है कि माजरा क्या हैघ् अब देखना है कि अगले वर्ष उत्तरप्रदेश में चुनाव हैं ऐसे में भगवा बनाम भगवा और संत बनाम संत की इस लड़ाई में किसेए कितना नफा.नुकसान होता है क्योंकि इतने बड़े मसले पर भाजपा केन्द्रीय नेतृत्व या पार्टी की चुप्पी भी बड़ा इशारा जरूर करती है। ईएमएस / 09 फरवरी 25