लोकसभा अध्यक्ष का पद भारतीय लोकतंत्र की आत्मा है। यह वह आसन है, जो सत्ता और विपक्ष के बीच संतुलन बनाए रखने का संवैधानिक प्रावधान एवं जिम्मेदारी का प्रतीक है। संविधान में परिभाषित है। लोकसभा का अध्यक्ष और राज्य सभा का सभापति पार्टीगत राजनीति से ऊपर उठकर सदन का संचालन करेगा। दोनों ही सदन में सभी सदस्यों के हितों के संरक्षण की जिम्मेदारी अध्यक्ष और सभापति की होती है। हालिया घटनाक्रम ने इसी धारणा को कटघरे में खड़ा कर दिया है। विपक्ष द्वारा लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी करना कोई साधारण राजनीतिक घटना नहीं है। संसदीय लोकतंत्र की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़ा हो गया है। पिछले कई सत्रों से लोकसभा में विपक्ष आरोप लगाता रहा है, उन्हें सदन में बोलने का अवसर नहीं दिया जा रहा। बोलने के पहले तरह-तरह से उन्हें रोका जा रहा है। सदन के अंदर सदस्यों को बोलने की जो स्वतंत्रता थी, उसे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से बाधित किया जा रहा है। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव जैसे संवैधानिक और परंपरागत अवसर पर भी विपक्ष के नेता राहुल गांधी को बोलने की अनुमति न मिलना वहीं सत्ता पक्ष के एक सदस्य को बोलने का अवसर दिया गया। इसने असंतोष को आर और पार की लड़ाई में लाकर खड़ा कर दिया है। विपक्ष का कहना है कि सत्ता पक्ष को खुली छूट दी जाती है। जबकि विपक्ष को सवालों ओर नियमों का हवाला देकर बोलने नहीं दिया जाता है। विपक्ष यह कहने से नहीं चूक रहा है, कि आसंदी द्वारा सत्ता पक्ष के लिए अलग, विपक्ष के साथ अलग व्यवहार किया जा रहा है। लोकसभा अध्यक्ष का यह तर्क कि “सदन नियम और परंपरा से चलेगा” अपने आप में सही है, लेकिन सवाल यह है, कि क्या ये नियम सबके लिए समान रूप से लागू हो रहे हैं? पिछले 10 वर्षों में विपक्ष द्वारा जब भी कोई स्थगन प्रस्ताव अध्यक्ष को दिया गया, किसी को मंजूरी नहीं दी गई। जबकि परंपराएं और लोकसभा की कार्यवाही में ऐसे दर्जनों उदाहरण हैं जहां पर विपक्ष को स्थगन प्रस्ताव में बोलने का अवसर दिया गया। जब सत्ता पक्ष कांग्रेस को “गद्दार” कहता है, तब वह सदन की मर्यादा है? और जब विपक्ष उसका जवाब देना चाहता है, तब उसे “आउट ऑफ प्रोसीडिंग” बताकर रोक दिया जाता है। तो यह किस तरह की निष्पक्षता है? विपक्ष का आरोप है कि अध्यक्ष का व्यवहार निष्पक्ष एवं मध्यस्थता वाला नहीं है। ऐसा स्पष्ट रूप से दिख रहा है। आसंदी का व्यवहार सत्ता पक्ष के रक्षक का है। पिछले वर्षों में जिस तरह से बिल और कानूनों को बिना किसी चर्चा के हो हल्ले में पास कर दिया गया। यही कारण है कि विपक्ष ने अब अविश्वास प्रस्ताव जैसा असाधारण कदम उठाने का मन बनाया है। पिछले 76 सालों में लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव तीन बार लाया गया है। चौथी बार ऐसी स्थिति बनना अपने आप में असाधारण और चिंताजनक है। संविधान के अनुसार, अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर के साथ लिखित नोटिस आवश्यक होता है। यह प्रस्ताव तभी लाया जाता है जब विपक्ष यह मान ले कि अध्यक्ष सदन की निष्पक्षता बनाए रखने में असफल हैं। विपक्ष इस मुद्दे पर एकमत हैं। महिला सांसदों ने भी लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर अपनी नाराजी जताई है। जो यह दर्शाता है, असंतोष केवल एक दल अथवा एक वर्ग तक सीमित नहीं है। इस पूरे विवाद का सबसे गंभीर पहलू यह है, पिछले कई वर्षों में सदन के सत्र छोटे होते जा रहे हैं। संसद की कार्यवाही बार-बार ठप्प होना अब सामान्य हो गया है। इसका लाभ उठा कर सत्ता पक्ष बिल पास कर लेती है। बजट जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा के बजाय बार-बार कार्यवाही स्थगित होना, अध्यक्ष द्वारा सत्ता पक्ष और विपक्ष को विश्वास में नहीं लिया जाता है। जबकि नियमों के अनुसार विपक्ष की आवाज को अध्यक्ष का संरक्षण मिलना चाहिए। आसंदी की इस कार्रवाई से लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर करता है। इतिहास गवाह है, जब-जब अध्यक्ष ने निष्पक्षता दिखाई, तब-तब विपक्ष ने भी मर्यादा का पालन किया है। जब कुर्सी की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तब सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच में टकराव बढ़ता है। वर्तमान में स्थिति यहां तक पहुंच गई है, अध्यक्ष का आसन राजनीतिक बहस का मुद्दा बन गया है। वर्तमान स्थिति केवल ओम बिरला या लोकसभा अध्यक्ष के पद या बजट सत्र की नहीं है, यह उस संविधान एवं लोकतांत्रिक परंपरा की परीक्षा है जिसे भारत के संसदीय लोकतंत्र ने कई दशकों में गढ़ा गया है। यदि अध्यक्ष की निष्पक्षता पर विश्वास उठता है, तो केवल विपक्ष नहीं, पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था एवं संविधान भी कमजोर होता है। आवश्यकता इस बात की है, लोकसभा अध्यक्ष अपने पद की गरिमा को पुनः स्थापित करें। सत्ता और विपक्ष, दोनों के लिए समान नियम और समान अवसर सुनिश्चित करें। विपक्ष के पास बहुमत नहीं होता है इसलिए उसे संरक्षण की जरूरत होती है। सत्ता पक्ष की दादागिरी से अध्यक्ष ही विपक्ष को संरक्षण दे सकता है। लोकतंत्र केवल बहुमत से नहीं, बल्कि संवाद और विश्वास के सहारे चलता है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों मिलकर आवाम की आवाज को सदन में लेकर आते हैं। सत्ता पक्ष से ज्यादा वोट विपक्ष के पास होते हैं। विपक्ष बटा हुआ होता है, इसलिए सत्ता पक्ष राज करता है। सदन में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की सामूहिक जिम्मेदारी है। लोकसभा अध्यक्ष को इस बात को ध्यान में रखना जरूरी है। लोकसभा के अध्यक्ष भले बहुमत से चुने जाते हों, लेकिन अध्यक्ष चुने जाने के बाद सभी सदस्यों के अध्यक्ष होते हैं। ईएमएस / 09 फरवरी 26