स्कूल और अस्पताल जलाने वालों को बख्शा नहीं जाएगा जगदलपुर(ईएमएस)। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सोमवार को बस्तर संभाग के मुख्यालय जगदलपुर के ऐतिहासिक लालबाग मैदान में आयोजित तीन दिवसीय संभाग स्तरीय बस्तर पण्डुम के समापन समारोह में कहा कि सरकार बस्तर की संस्कृति को आने वाले दशकों तक सुरक्षित रखना चाहती है। अमित शाह ने कहा कि पीएम मोदी का लक्ष्य बस्तर की संस्कृति और विरासत को विश्व पटल तक पहुंचाना है, ताकि इसकी पहचान बंदूक और विस्फोटकों से नहीं बल्कि परंपरा से हो। शेष बचे कई नक्सलियों में युवा आदिवासी लड़कियां भी शामिल हैं, उनका पुनर्वास जरूरी है क्योंकि उनका पूरा जीवन आगे पड़ा है। अमित शाह ने नक्सलियों से आत्मसमर्पण की अपील की। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की माओवादी पुनर्वास नीति सबसे आकर्षक है। जो लोग गोली चलाना, स्कूल और अस्पताल जलाना जारी रखेंगे, उन्हें बख्शा नहीं जाएगा, हिंसा का कड़ा जवाब मिलेगा। माओवाद ने समाज को कभी लाभ नहीं पहुंचाया, जहां भी रहा वहां विनाश ही हुआ, कोलंबिया, पेरू, कंबोडिया जैसे देशों में भी यही देखा गया। शाह के बस्तर आगमन पर हजारों स्कूली बच्चों ने ऐसा जादू है मेरे बस्तर में गीत पर सांस्कृतिक प्रस्तुति देकर उनका स्वागत किया। यह गीत बस्तर की प्राकृतिक सुंदरता को दर्शाता है और इसे हिंदी व हल्बी बोली में रचा गया है। बस्तर सबसे विकसित संभाग बनेगा गृह मंत्री ने आगे कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार ने जनजातीय कलाकारों को मंच देकर बस्तर की संस्कृति को नया जीवन दिया है और अब यह क्षेत्र विकास की राह पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि बस्तर को सबसे विकसित संभाग बनाया जाएगा। नक्सलवाद खत्म होते ही नई पर्यटन गतिविधियां शुरू होंगी। बस्तर में 118 एकड़ में नया औद्योगिक क्षेत्र विकसित किया जा रहा है, जिससे आदिवासी युवाओं को रोजगार मिलेगा, वहीं रावघाट योजना भी तेजी से आगे बढ़ रही है और इससे क्षेत्र के विकास को नई गति मिलेगी। शाह ने भरोसा दिलाया कि बस्तर को प्रदेश का सबसे विकसित संभाग बनाया जाएगा। उन्होंने ये बातें जगदलपुर के लालबाग मैदान में आयोजित बस्तर पंडुम के मंच से कही। इससे पहले स्वागत के दौरान उन्हें कौड़ी की माला और पारंपरिक पगड़ी पहनाई गई। अमित शाह ने कहा कि बस्तर की पहचान बारूद नहीं, बल्कि उसकी समृद्ध संस्कृति और कला है। बस्तर पंडुम पहले 7 विधाओं तक सीमित था, लेकिन अब 5 नई विधाएं जुडऩे से यह 12 विधाओं का उत्सव बन गया है। उन्होंने कहा कि बस्तर की कला और संस्कृति विश्व में अद्वितीय है, जिसे प्रभु श्रीराम के समय से संजोकर रखा गया है। आयोजन में करीब 55 हजार लोगों ने भाग लिया, जिसमें दंतेवाड़ा से सबसे अधिक सहभागिता रही और अबूझमाडिय़ा, माडिय़ा व मुरिया जनजातियों ने बढ़-चढक़र हिस्सा लिया। विनोद उपाध्याय / 09 फरवरी, 2026