लेख
21-Feb-2026
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नई दिल्ली के भारत मंडपम में 16 से 20 फरवरी 2026 तक आयोजित एआई इम्पैक्ट सम्मेलन भारत के आधुनिक इतिहास में एक निर्णायक क्षण के रूप में दर्ज किया जाएगा।यह केवल एक अन्तराष्ट्रीय तकनीकी सम्मेलन नहीं था,बल्कि एक सभ्यतागत घोषणा थी - कि भारत अब अपनी नियति कृत्रिम बुद्धिमत्ता की शक्ति से गढ़ना चाहता है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव के नेतृत्व में यह आयोजन भारत की उस महत्त्वाकांक्षा का प्रतीक बना, जिसमें तकनीक विकास का साधन नहीं,बल्कि राष्ट्र-निर्माण का दर्शन बन रही है।प्रधानमंत्री मोदी ने उद्घाटन भाषण में जिस आत्म विश्वास से कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता भारत का भाग्य और भविष्य है,वह कथन किसी राजनीतिक भाषण से अधिक एक रणनीतिक उद्घोष था।यह उस भारत की आवाज़ थी,जो औपनिवेशिक युग में औद्योगिक क्रांति से वंचित रहा, जिसने सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति में सेवा क्षेत्र तक स्वयं को सीमित रखा,और अब तीसरी बड़ी तकनीकी क्रांति—कृत्रिम बुद्धिमत्ता - में नेतृत्व की आकांक्षा रखता है। मोदी सरकार के लिए एआई केवल तकनीकी उपकरण नहीं,बल्कि विकसित भारत 2047 के स्वप्न का मुख्य इंजन है।जिस प्रकार बीसवीं सदी में रेल,बिजली और सड़क राष्ट्र-निर्माण की आधारशिला बने, उसी प्रकार इक्कीसवीं सदी में डेटा, एल्गोरिद्म और सुपरकंप्यूटिंग को राष्ट्रीय बुनियादी ढाँचे के रूप में देखा जा रहा है।प्रधानमंत्री ने एआई को “डिजिटल स्वराज” का मार्ग बताया - एक ऐसा स्वराज जिसमें भारत तकनीक का उपभोक्ता नहीं, बल्कि निर्माता और नियंता होगा। अश्विनी वैष्णव का दृष्टिकोण इस स्वप्न को संस्थागत ढाँचा देने का प्रयास है।उन्होंने एआई को राष्ट्रीय इंफ्रास्ट्रक्चर की संज्ञा देते हुए कहा कि भारत को अपने स्वयं के फाउंडेशन मॉडल,राष्ट्रीय डेटा ग्रिड और सुपरकंप्यूटिंग क्षमता विकसित करनी होगी।उनका मानना था कि एआई भारत के लिए वही भूमिका निभाएगा, जो बीसवीं सदी में रेलवे और बिजली ने निभाई—देश को जोड़ने और गति देने की भूमिका। एआई इम्पैक्ट सम्मेलन में कई रणनीतिक घोषणाएँ की गईं, जो भारत के तकनीकी भविष्य की दिशा निर्धारित करती हैं।सरकार ने राष्ट्रीय एआई कंप्यूट ग्रिड, स्वदेशी भाषा मॉडल,सरकारी सेवाओं में एआई के व्यापक उपयोग,स्वास्थ्य और शिक्षा में डिजिटल प्लेटफॉर्म, स्मार्ट शहरों और रक्षा प्रणालियों में एआई आधारित समाधान विकसित करने की प्रतिबद्धता दोहराई। भारत को एआई अनुसंधान, स्टार्टअप और उद्योग का वैश्विक केंद्र बनाने के लिए नीति,वित्त और अवसंरचना के समन्वित प्रयासों की घोषणा की गई।इस सम्मेलन की एक प्रमुख उपलब्धि विदेशी निवेश को आकर्षित करने की दिशा में थी। वैश्विक टेक कंपनियों, निवेश फंडों और बहुराष्ट्रीय निगमों ने भारत के एआई पारिस्थितिकी तंत्र में निवेश की रुचि दिखाई।डेटा सेंटर,क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर, सेमीकंडक्टर, चिप डिजाइन और एआई स्टार्टअप में अरबों डॉलर के निवेश प्रस्तावों की चर्चा हुई।भारत को एआई निर्माण और अनुसंधान का वैश्विक हब बनाने के लिए कई अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों की घोषणा की गई। यह संकेत है कि वैश्विक पूंजी भारत को अगली तकनीकी क्रांति का महत्वपूर्ण केंद्र मान रही है। विदेशी निवेश के साथ रोजगार की संभावनाएँ भी इस सम्मेलन का केंद्रीय विषय रहीं।सरकार और उद्योग जगत का दावा है कि एआई भारत में लाखों नई नौकरियाँ पैदा करेगा - डेटा वैज्ञानिक, एआई इंजीनियर, साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ, चिप डिजाइनर, डिजिटल सेवा प्रदाता और तकनीकी प्रशिक्षक जैसे क्षेत्रों में। साथ ही, एआई आधारित स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि और प्रशासनिक सेवाओं में नए प्रकार के रोजगार उत्पन्न होंगे। यह आशा व्यक्त की गई कि भारत की विशाल युवा जनसंख्या को एआई युग के लिए कौशल प्रदान कर वैश्विक कार्यबल का नेतृत्व करने के लिए तैयार किया जाएगा। परंतु इतिहास हमें सिखाता है कि हर तकनीकी क्रांति अवसरों के साथ विस्थापन भी लाती है। औद्योगिक क्रांति ने पारंपरिक कारीगरों को विस्थापित किया, सूचना क्रांति ने डिजिटल डिवाइड को जन्म दिया, और एआई क्रांति मानव श्रम के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा कर रही है।मशीनें न केवल शारीरिक श्रम, बल्कि बौद्धिक श्रम भी करने लगी हैं।पत्रकारिता, बैंकिंग, कानून,शिक्षा,चिकित्सा और प्रशासन जैसे क्षेत्रों में एआई का प्रवेश तेजी से हो रहा है।आम आदमी के मन में यह भय स्वाभाविक है कि कहीं यह तकनीक उसकी आजीविका न छीन ले।सरकार कौशल विकास और पुनः प्रशिक्षण की बात करती है, परंतु भारत जैसे विशाल और विविध समाज में यह कार्य कितना प्रभावी होगा, यह एक खुला प्रश्न है। ग्रामीण,असंगठित और कम शिक्षित श्रमिक वर्ग के लिए एआई युग में समायोजन आसान नहीं होगा।यदि एआई नीति सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा सुधार और रोजगार पुनर्गठन के साथ नहीं जुड़ी,तो यह तकनीकी प्रगति सामाजिक असंतोष का कारण बन सकती है। एक अन्य गहरा प्रश्न मानव निर्णयों पर मशीन के प्रभाव का है। यदि शासन,न्याय और सुरक्षा में एआई का उपयोग बढ़ता है,तो मानवीय विवेक,नैतिकता और संवेदना का स्थान एल्गोरिद्म ले सकता है। एल्गोरिद्म निष्पक्ष होने का दावा करता है, परंतु वह भी मानव निर्मित होता है और उसमें मानव पूर्वाग्रह समाहित हो सकते हैं। लोकतंत्र में अंतिम निर्णय मानव प्रतिनिधियों और संस्थाओं के हाथ में होना चाहिए,परंतु एआई की बढ़ती भूमिका लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व को जटिल बना सकती है।डेटा और गोपनीयता का प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है।एआई डेटा पर आधारित है,डेटा आधुनिक युग का नया तेल बन चुका है।नागरिकों की निजी जानकारी,व्यवहार, स्वास्थ्य,शिक्षा और वित्तीय विवरण एआई प्रणालियों में प्रवाहित होंगे। यह प्रश्न उठता है कि इस डेटा का स्वामी कौन होगा - नागरिक,सरकार या कॉर्पोरेट? भारत में डेटा संरक्षण कानून विकसित हो रहे हैं, परंतु आम नागरिक के मन में यह आशंका है कि कहीं उसकी निजता तकनीकी प्रगति की बलि न चढ़ जाए।डिजिटल असमानता का प्रश्न भारत के लिए विशेष रूप से गंभीर है। भारत एक असमान समाज है—शहरी और ग्रामीण, अमीर और गरीब, शिक्षित और अशिक्षित के बीच गहरी खाई है।यदि एआई केवल शहरी,अंग्रेज़ी-भाषी और तकनीकी रूप से सक्षम वर्ग तक सीमित रहा,तो यह खाई और गहरी हो सकती है। मोदी सरकार भारतीय भाषाओं में एआई मॉडल विकसित करने की बात करती है, ताकि ग्रामीण और क्षेत्रीय भाषाओं के नागरिक भी लाभान्वित हों।यह एक सकारात्मक संकेत है,परंतु इसे नीति और संसाधनों के स्तर पर वास्तविक रूप देना चुनौतीपूर्ण होगा।एआई इम्पैक्ट सम्मेलन 26 में भारत बनाम अमेरिका और चीन की तकनीकी प्रतिस्पर्धा का संदर्भ भी स्पष्ट था। अमेरिका एआई अनुसंधान और नवाचार में अग्रणी है, चीन एआई को राज्य-नियंत्रित रणनीतिक हथियार के रूप में विकसित कर रहा है, और भारत तीसरा रास्ता खोज रहा है—लोकतांत्रिक, समावेशी और मानव-केंद्रित एआई विकास का मॉडल। यह एक कठिन लेकिन नैतिक रूप से आवश्यक मार्ग है। यदि भारत इस मार्ग पर सफल होता है, तो वह केवल तकनीकी शक्ति नहीं, बल्कि नैतिक वैश्विक नेतृत्व भी स्थापित कर सकता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल तकनीक नहीं, बल्कि मानव चेतना, समाज और सभ्यता को पुनर्परिभाषित करने वाली शक्ति है। भारतीय दर्शन में बुद्धि को विवेक, धर्म और करुणा से जोड़ा गया है। मशीन बुद्धि में यह विवेक और करुणा कहाँ से आएगी? यह प्रश्न केवल तकनीकी नहीं, बल्कि दार्शनिक और आध्यात्मिक भी है। भारत, जो योग, दर्शन और मानव चेतना के अध्ययन की प्राचीन परंपरा रखता है, एआई युग में मानव और मशीन के संबंध पर वैश्विक विमर्श का नेतृत्व कर सकता है। एआई इम्पैक्ट 2026 इस द्वंद्व का प्रतीक था - एक ओर भारत का स्वप्न, दूसरी ओर भारत का भय। मोदी मिशन और वैष्णव विजन भारत को एआई महाशक्ति बनाने का संकल्प लेते हैं। विदेशी निवेश, तकनीकी साझेदारी और रोजगार की संभावनाएँ भारत के लिए ऐतिहासिक अवसर प्रस्तुत करती हैं। यदि भारत एआई उत्पादन, चिप निर्माण,डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर और अनुसंधान में आत्मनिर्भर बनता है, तो वह 21वीं सदी की वैश्विक अर्थव्यवस्था का प्रमुख स्तंभ बन सकता है। परंतु यह यात्रा तभी सफल होगी, जब एआई को लोकतांत्रिक, समावेशी और मानव-केंद्रित बनाया जाएगा। तकनीक को पूंजी और सत्ता के केंद्रीकरण का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और मानव कल्याण का माध्यम बनाना होगा। रोजगार पुनर्गठन, शिक्षा सुधार, डिजिटल समावेशन और डेटा संरक्षण को एआई नीति के साथ एकीकृत करना होगा।एआई भारत का भाग्य और भविष्य बन सकता है, परंतु केवल तब,जब यह मानवता का विस्तार बने, उसका विकल्प नहीं। भारत के सामने अवसर भी है और चुनौती भी। एआई इम्पैक्ट 2026 ने भविष्य का द्वार खोल दिया है—अब यह भारत पर निर्भर है कि वह इस द्वार से होकर एक न्यायपूर्ण, समावेशी और विवेकपूर्ण तकनीकी सभ्यता की ओर बढ़ता है, या फिर एक ऐसी मशीन-प्रधान दुनिया की ओर, जहाँ मानव केवल उपभोक्ता बनकर रह जाए।भारत का भाग्य और भविष्य अब एल्गोरिद्म,डेटा और मशीनों की प्रयोगशालाओं में लिखा जा रहा है, परंतु उसकी आत्मा अभी भी मानव विवेक,करुणा और लोकतंत्र में बसती है। यही द्वंद्व एआई युग के भारत की सबसे बड़ी कहानी भी है जिम्मेदारी भी होगी जो अभी अतीत के गर्भ में छुपी है। ईएमएस/21/02/2025