देश में मुफ्त योजनाओं को लेकर चल रही बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर तीखी टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि सरकारें सुबह से शाम तक लोगों को मुफ्त राशन गैस और बिजली देती रहेंगी तो लोग काम क्यों करेंगे। इससे काम करने की आदत खत्म हो सकती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकारों को रोजगार सृजन पर ध्यान देना चाहिए ताकि लोग सम्मानपूर्वक अपनी आजीविका कमा सकें। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह टिप्पणी तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड की याचिका पर सुनवाई के दौरान की। कंपनी ने ऐसे प्रावधान को चुनौती दी है जिसमें उपभोक्ताओं की आर्थिक स्थिति देखे बिना सभी को मुफ्त बिजली देने का प्रस्ताव रखा गया है। अदालत ने सवाल उठाया कि जो लोग भुगतान करने में सक्षम हैं और जो नहीं हैं उनके बीच बिना कोई अंतर किए मुफ्त सुविधा देना क्या तुष्टीकरण की नीति नहीं है। पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली भी शामिल थे। अदालत ने कहा कि देश के अधिकांश राज्य राजस्व घाटे से जूझ रहे हैं और इसके बावजूद विकास कार्यों की बजाय मुफ्त घोषणाओं पर जोर दिया जा रहा है। न्यायालय ने यह भी पूछा कि चुनावों के आसपास ऐसी योजनाओं की घोषणा क्यों की जाती है और क्या इससे वित्तीय अनुशासन प्रभावित नहीं होता। अदालत की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब राज्यों की वित्तीय स्थिति पर गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं। आंकड़ों के अनुसार 19 राज्यों की कुल सब्सिडी का लगभग 53 प्रतिशत हिस्सा केवल बिजली सब्सिडी पर खर्च होता है। वर्ष 2024 25 में राज्यों का संयुक्त राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद का 3.3 प्रतिशत रहा है। मार्च 2025 तक राज्यों पर कुल कर्ज जीडीपी का 27.5 प्रतिशत रहा और अगले वर्ष इसके 29 प्रतिशत से अधिक होने का अनुमान है। ब्याज भुगतान की दर भी राजस्व वृद्धि से तेज गति से बढ़ रही है। तमिलनाडु में घरेलू उपभोक्ताओं को हर दो महीने में लगभग 100 यूनिट तक मुफ्त बिजली दी जाती है। पंजाब में बड़ी मात्रा में बिजली सब्सिडी दी जा रही है। दिल्ली में सीमित यूनिट तक बिजली और पानी मुफ्त या रियायती दर पर उपलब्ध है। बिहार और हिमाचल प्रदेश में भी घरेलू उपभोक्ताओं को निर्धारित सीमा तक मुफ्त बिजली दी जा रही है। कई राज्यों में किसानों को सिंचाई के लिए मुफ्त बिजली उपलब्ध कराई जाती है। इन योजनाओं का उद्देश्य राहत देना है परंतु इनके दीर्घकालिक आर्थिक प्रभावों को लेकर बहस जारी है। सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले भी मुफ्त राशन और अन्य रियायतों पर चिंता जताई थी। अदालत ने कहा था कि अनिश्चितकाल तक मुफ्त वितरण से लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने के बजाय निर्भरता बढ़ सकती है। हालांकि न्यायालय ने यह भी माना कि गरीबों और जरूरतमंदों को राहत देना कल्याणकारी राज्य की जिम्मेदारी है। प्रश्न यह है कि सहायता लक्षित होनी चाहिए या सार्वभौमिक। भारत में मुफ्त योजनाओं का इतिहास नया नहीं है। 1950 और 1960 के दशक में मद्रास राज्य में कामराज ने मुफ्त शिक्षा और मध्याह्न भोजन की शुरुआत की थी। बाद के दशकों में तमिलनाडु आंध्र प्रदेश और अन्य राज्यों में सस्ती दर पर चावल वितरण की योजनाएं आईं। समय के साथ मुफ्त टीवी साइकिल लैपटॉप और घरेलू उपकरण तक चुनावी वादों का हिस्सा बने। 2015 के बाद दिल्ली और पंजाब जैसे राज्यों में मुफ्त बिजली और पानी प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बन गया। महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा और प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता जैसी योजनाएं भी विभिन्न राज्यों में लागू हुईं। समर्थकों का तर्क है कि सामाजिक असमानता वाले देश में कमजोर वर्गों को बुनियादी सुविधाएं देना सरकार का दायित्व है। शिक्षा स्वास्थ्य भोजन और ऊर्जा जैसी आवश्यक सेवाओं पर राहत से जीवन स्तर सुधरता है और मानव संसाधन मजबूत होता है। आलोचकों का कहना है कि यदि योजनाएं वित्तीय क्षमता से अधिक हों तो विकास परियोजनाओं पर असर पड़ता है और कर्ज का बोझ बढ़ता है। इससे आने वाली पीढ़ियों पर भार पड़ सकता है। अदालत ने संतुलन की आवश्यकता पर जोर दिया है। उसने कहा कि सरकारों को ऐसी नीतियां बनानी चाहिए जो लोगों को आत्मनिर्भर बनाए। रोजगार सृजन कौशल विकास और उद्योगों को प्रोत्साहन दीर्घकालिक समाधान हो सकते हैं। साथ ही लक्षित सब्सिडी व्यवस्था से वास्तव में जरूरतमंद लोगों तक सहायता पहुंचाई जा सकती है। फ्रीबीज बनाम विकास की यह बहस आने वाले समय में और तेज होने की संभावना है। राज्यों के सामने चुनौती यह है कि वे सामाजिक सुरक्षा और वित्तीय अनुशासन के बीच संतुलन कैसे स्थापित करें। सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी ने इस मुद्दे को फिर राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया है। अब देखना होगा कि राजनीतिक दल और सरकारें इस पर किस प्रकार की नीति अपनाती हैं और क्या भविष्य में मुफ्त योजनाओं के लिए कोई स्पष्ट दिशानिर्देश तय किए जाते हैं। (L 103 जलवन्त टाऊनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट ,रोड, नियर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार,स्तम्भकार) ईएमएस / 24 फरवरी 26