-यह समूह आर्थिक सहयोग, निवेश, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा और तकनीक पर है केंद्रित इजराइल (ईएमएस)। पीएम नरेंद्र मोदी के इजराइल दौरे के दौरान इजराइली पीएम नेतन्याहू ने साफ संकेत दिया कि वे भारत के साथ मिलकर आई2यू2 समूह के तहत सहयोग को और मजबूत करना चाहते हैं। बता दें आई2यू2 समूह में भारत, इजराइल, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका शामिल हैं। आधिकारिक तौर पर यह समूह आर्थिक सहयोग, निवेश, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा और तकनीक पर केंद्रित है, लेकिन बदलते हुए परिदृश्य में इसका रणनीतिक महत्व भी बढ़ता दिख रहा है। अगर यह गठबंधन पूरी क्षमता से सक्रिय होता है, तो इसका असर सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि राजनीतिक और सामरिक संतुलन पर भी पड़ सकता है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिम एशिया में पहले से ही अलग-अलग ध्रुव उभर रहे हैं। एक ओर पाकिस्तान, तुर्की और कुछ हद तक सऊदी अरब जैसे देशों का पारंपरिक प्रभाव है, तो दूसरी ओर यूएई और कुछ अन्य अरब देश इजराइल के साथ सहयोग की राह पर बढ़ चुके हैं। ऐसे में अगर आई2यू2 मजबूत होता है और भारत-इजराइल-यूएई-अमेरिका का तालमेल गहरा होता है, तो मुस्लिम वर्ल्ड साफ तौर पर बंट जाएगा। यह विभाजन विचारधारा से ज्यादा रणनीतिक हितों पर आधारित होगा। यूएई और कुछ अन्य खाड़ी देश पहले ही इजराइल के साथ संबंध सामान्य कर चुके हैं। यदि वे आर्थिक और सुरक्षा सहयोग के नए ढांचे में सक्रिय भूमिका निभाते हैं, तो पाकिस्तान की पारंपरिक इस्लामी एकजुटता की राजनीति को चुनौती मिल सकती है। पाकिस्तान ने सऊदी अरब से भी इसी इस्लामिक कार्ड के बल पर सुरक्षा समझौता कर लिया। ऐसे में अगर लिबरल खाड़ी देश भारत और इजराइल के साथ खड़े होते हैं, तो पाकिस्तान की कूटनीतिक स्थिति कमजोर हो सकती है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था भी काफी हद तक खाड़ी देशों की सहायता और निवेश पर निर्भर रही है। वही देश भारत के साथ बड़े निवेश और टेक्नोलॉजी साझेदारी में अधिक रुचि दिखाते हैं, तो क्षेत्रीय प्राथमिकताएं बदल सकती हैं, जैसा यूएई के मामले में हुआ। इससे पाकिस्तान को रणनीतिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर नुकसान उठाना पड़ सकता है। हालांकि यह भी ध्यान रखना होगा कि सऊदी अरब की स्थिति जटिल है। वह एक तरफ अमेरिका और खाड़ी सहयोग परिषद का प्रमुख देश है, तो दूसरी तरफ वह अपने क्षेत्रीय संतुलन को साधकर चलता है। इसलिए मुस्लिम दुनिया का दो खेमों में बंटना पूरी तरह औपचारिक गठबंधन के रूप में शायद न दिखे, लेकिन प्रभाव और झुकाव के आधार पर विभाजन गहरा सकता है। भारत के लिए यह स्थिति अवसर भी है और चुनौती भी। इजराइल लंबे समय से अमेरिका का करीबी सहयोगी रहा है। ऐसे में वह भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक समझ को और मजबूत करने में पुल की भूमिका निभा सकता है। रक्षा तकनीक, खुफिया सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दों पर त्रिपक्षीय तालमेल भविष्य में और बढ़ सकता है। कुल मिलाकर अगर आई2यू2 जैसे मंच सक्रिय और प्रभावी रूप से काम करते हैं, तो पश्चिम एशिया की शक्ति-संतुलन की राजनीति में बड़ा बदलाव दिख सकता है। सिराज/ईएमएस 27 फरवरी 2026