रायसेन ।जिले में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) के नाम में बदलाव और प्रशासनिक फेरबदल के बाद व्यवस्थाएं अभी तक पूरी तरह पटरी पर नहीं लौट सकी हैं। हालात यह हैं कि पिछले तीन महीनों से योजना से जुड़े अधिकारी-कर्मचारियों के वेतन अटके पड़े हैं। वेतन न मिलने से कर्मचारियों में असंतोष बढ़ता जा रहा है, वहीं जमीनी स्तर पर काम की रफ्तार भी प्रभावित हो रही है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, जिले की चार सौ इक्यानवे ग्राम पंचायतों में तकनीकी सहायक, रोजगार सहायक, कंप्यूटर ऑपरेटर और उपयंत्री जैसे पदों पर कार्यरत कर्मचारियों को नियमित भुगतान नहीं मिल पा रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि पोर्टल और बजट आवंटन से जुड़ी प्रक्रियाओं में बदलाव के चलते भुगतान लंबित है। कई बार उच्च अधिकारियों को अवगत कराने के बाद भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सका है। इधर, पंचायत स्तर पर निर्माण कार्यों की प्रगति भी सुस्त पड़ी है। ग्रामीण सड़कों, तालाब गहरीकरण और मिट्टी कार्य जैसी योजनाएं कागजों में तो स्वीकृत हैं। लेकिन भुगतान में देरी के कारण काम की गति धीमी बताई जा रही है। कुछ ग्राम पंचायतों में मजदूरों को भी समय पर मजदूरी नहीं मिलने की शिकायत सामने आई है जिससे योजना की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं। कर्मचारियों का कहना है कि तीन महीने से वेतन न मिलने के कारण परिवार का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा है। किराया, बच्चों की फीस और दैनिक जरूरतों के लिए उन्हें उधार का सहारा लेना पड़ रहा है। कई कर्मचारियों ने चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र भुगतान नहीं हुआ तो वे सामूहिक रूप से जिला मुख्यालय पर ज्ञापन सौंपकर आंदोलन की राह पकड़ सकते हैं। इस संबंध में जिला पंचायत के सीईओ कमल सोलंकी का कहना है कि तकनीकी कारणों और बजट स्वीकृति में विलंब से भुगतान प्रभावित हुआ है। जल्द ही लंबित वेतन जारी करने की प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी। अधिकारियों ने भरोसा दिलाया है कि योजना को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं। फिलहाल, जिले में मनरेगा की रफ्तार सुस्त पड़ने से ग्रामीणों और कर्मचारियों दोनों की उम्मीदें अधर में लटकी हैं। बहरहाल अब देखना होगा कि प्रशासन कब तक हालात सामान्य कर पाता है। किशोर वर्मा ( ईएमएस) रायसेन