क्षेत्रीय
01-Mar-2026


बिलासपुर (ईएमएस)। वैवाहिक वैधता और भरण-पोषण के अधिकार को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट और सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने कहा कि जब तक पहली शादी कानूनी रूप से समाप्त न हो, दूसरी शादी को मान्यता नहीं मिल सकती। ऐसी स्थिति में दूसरे पति से गुजारा भत्ता मांगना कानून के अनुरूप नहीं है। प्रकरण भिलाई की एक महिला से जुड़ा है। 10 जुलाई 2020 को उसने खुद को अविवाहित बताते हुए आर्य समाज मंदिर में विवाह किया, जबकि उसका पहला विवाह विधिक रूप से कायम था और तलाक की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई थी। बाद में वैवाहिक विवाद हुआ और महिला अलग रहने लगी। उसने दुर्ग फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर प्रति माह एक लाख रुपये भरण-पोषण की मांग की। याचिका में पति की मासिक आय लगभग पांच लाख रुपये बताई गई। दुर्ग फैमिली कोर्ट ने विवाह की वैधता पर प्रश्न उठाते हुए भरण-पोषण का दावा खारिज कर दिया। इस आदेश को महिला ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की सिंगल बेंच में हुई। सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि पहली शादी की जानकारी छिपाकर दूसरा विवाह किया गया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत पहली शादी के रहते दूसरी शादी अवैध मानी जाएगी। जब विवाह ही कानूनी रूप से मान्य नहीं है, तो उससे उत्पन्न भरण-पोषण का दावा भी स्वीकार्य नहीं हो सकता। अदालत ने 20 जनवरी 2026 के फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए महिला की याचिका पूरी तरह खारिज कर दी। फैसले ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि वैवाहिक अधिकारों का दावा तभी टिकेगा, जब संबंध स्वयं कानून की कसौटी पर खरा उतरे। मनोज राज 01 मार्च 2026