ईरान पर इजराइल और अमेरिका द्वारा किए गए संयुक्त हमले के तीसरे दिन स्थिति बड़ी विकराल हो गई है। ईरान के सुप्रीमो लीडर खामेनेई की हत्या के बाद ईरान ने जिस तरह का पलटवार किया है, उससे दुनियां हैरान है। एक ही झटके में 13 देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानो पर ईरान ने हमला कर दिया। अमेरिका के सैन्य ठिकाने धू-धू करके जलने लगे। इन हमलों से मध्य पूर्व के इस्लामी देशों में बढ़ता तनाव एक बार फिर वैश्विक राजनीति के केंद्र में आ गया है। ईरान ने अमेरिका और इजराइल के हमले का जवाब जिस तरह से दिया है, उसे देखते हुए अमेरिका और इजराइल भी हतप्रभ होकर रह गए हैं। पहली बार अमेरिका को पश्चिम एशिया के देशों में तनाव बढ़ने से अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। ईरान की ओर से दावा किया गया है, उसने जवाबी कार्रवाई में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया। बहरीन स्थित जुफैर बेस और क़तर के अल उदैद एयरबेस जैसे ठिकानों पर किए गए हमले के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए जिनमें भारी नुकसान की तस्वीरें सामने आई हैं। इसके बाद सारी दुनिया में एक नई हलचल देखने को मिली। ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) ने संकेत दिया है। क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकाने उसकी मिसाइलों के निशाने पर हैं। दूसरी ओर, क़तर ने दावा किया, पैट्रियट मिसाइल डिफेंस सिस्टम ने संभावित हमलों को विफल कर बड़े नुकसान को रोका है। ऐसे परस्पर विरोधी दावों के बीच वास्तविक स्थिति का सही अंदाजा लगा पाना कठिन है। यह भी चर्चा है कि खाड़ी क्षेत्र के लगभग 13 देशों में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी है। तनाव बढ़ने पर वह भी अप्रत्यक्ष रूप से इस संघर्ष की चपेट में आ सकते हैं। ईरान ने जो फोटो और वीडियो जारी किए हैं उसके अनुसार 13 देशों के ठिकाने धू-धू करके जल रहे हैं। अभी तक स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा ईरान के दावों को सत्यापित नहीं किया गया है। युद्धकालीन माहौल में सूचनाओं का प्रवाह तेज होता है, परंतु सत्यापन की जानकारी जुटाना बहुत मुश्किल होता है। रणनीतिक दृष्टि से देखें, तो ईरान का मुकाबला दो परमाणु-सक्षम अमेरिका और इजराइल से है। इसके बावजूद तेहरान की त्वरित जवाबी क्षमता ने यह साबित कर दिया है। युद्ध के मैदान में सैन्य संतुलन एकतरफा नहीं है। चार दिन में ईरान इस युद्ध में अमेरिका और इजराइल को बराबरी से जवाब देने में सक्षम है। सवाल यह है, क्या यह टकराव सीमित रहेगा या व्यापक वैश्विक युद्ध के रूप में परिवर्तित हो जाएगा? इस युद्ध की शुरुआत से ही कच्चे तेल की आपूर्ति, समुद्री मार्गों को ईरान द्वारा बाधित किए जाने से वैश्विक बाजारों पर इसका प्रभाव पहले ही चार दिनों में बड़े पैमाने पर दिखने लगा है। विशेषज्ञों का मानना है, सैन्य शक्ति के प्रदर्शन से अधिक महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपाय अपनाने की पहल तुरंत की जानी चाहिए। यदि संवाद के रास्ते नहीं खुले, तो दावों और प्रतिदावों के बीच पूरी दुनिया को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। दुनिया भर के शेयर बाजार में गिरावट देखने को मिल रही है। भारत का शेयर बाजार एक तरह से क्रेस हो गया है। खाड़ी देशों में भारत का निर्यात-आयात पिछले चार दिनों से एक तरह से बंद हो गया है। लगभग 90 लाख भारतीय खाडी के देशों में काम करते हैं। इसके अलावा दुबई में भी भारतीयों का भारी निवेश है। ईरान जिस तरह से यूएई को निशाना बना रहा है उसके कारण भारत की आर्थिक सामरिक एवं राजनीतिक स्थिति पर चुनौतियां स्पष्ट रूप से दिखने लगी हैं। अमेरिका ईरान युद्ध शुरू होने के बाद जिस तरह से भारत के शेयर बाजार में निवेशकों को लगभग 8 लाख करोड रुपए का नुकसान 1 दिन में उठाना पड़ा है, वैश्विक व्यवस्था में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति में जो रोक लगी है, सारी दुनिया का आयात और निर्यात व्यापार बुरी तरह से प्रभावित हुआ है, इसको लेकर आर्थिक विशेषज्ञों द्वारा यह आशंका जताई जा रही है कि यह युद्ध जल्द बंद नहीं हुआ तो सारी दुनिया के देश आर्थिक मंदी के शिकार हो जाएंगे। इसके साथ-साथ तृतीय विश्व युद्ध जैसी स्थितियां बनते देर नहीं लगेंगी। सबसे बड़ी चिंता का विषय यह है भारत स्वयं एक पार्टी बन गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इजाराइल दौरे के तुरंत बाद ईरान पर हमला किया गया है। भारत की विदेश नीति में अब भारत का झुकाव अमेरिका और इजराइल की तरफ है। ऐसी स्थिति में भारत के ईरान और खाड़ी देशों के साथ बेहतर संबंध होते हुए भी भारत की मध्यस्थ के रूप में कोई भूमिका सामने नहीं आ रही है। उल्टे इस युद्ध में भारत को युद्ध में शामिल नहीं होते हुए भी भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। खाड़ी के देशों में लगभग 90 लाख से ज्यादा भारतीय नागरिक कार्यरत है उनसे विदेशी मुद्रा भी भारत को मिलती थी अब उनकी जान जोखिम में है। कच्चे तेल और गैस के दामों में जिस तरह की तेजी देखने को मिल रही है, शेयर बाजारों में जिस तरह से गिरावट का दौर देखने को मिल रहा है उससे स्पष्ट हो गया है, इस युद्ध का असर भारत पर सबसे ज्यादा पड़ने वाला है। भारत सरकार को बहुत सजग रहने की जरूरत है। ईएमएस / 03 मार्च 26