- जनसुनवाई में नहीं पहुंचा कोई ग्रामीण, सुनवाई करे बगैर ही लौटा अमला ग्रामीणों की मांग ग्राम सभा की अनुमति और वनाधिकार के बिना खनन नही बालाघाट (ईएमएस).घरों में जड़ा ताला, गांव में छाया सन्नाटा और खाली रही जनसुनवाई। इस जनसुनवाई में केवल प्रशासनिक अमले के अलावा कोई और नजर नहीं आया। यह आलम दक्षिण बैहर क्षेत्र के ग्राम पंचायत लूद में आयोजित प्रस्तावित पचामा दादर बॉक्साइट परियोजना की जनसुनवाई का था। ग्रामीणों ने सामूहिक रुप से इस जनसुनवाई का बहिष्कार कर दिया। नियत समय के बाद प्रशासनिक टीम बगैर सुनवाई के ही लौट गई। अब इस प्रस्तावित खनन परियोजना को लेकर क्षेत्र में विरोध लगातार तेज होता जा रहा है। इस बहिष्कार में क्षेत्रीय विधायक संजय उइके सहित कई जनप्रतिनिधि भी शामिल रहे। ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि जब तक उन्हें वनाधिकार मान्यता कानून 2006 के तहत वन संसाधनों पर अधिकार नहीं मिलते, तब तक किसी भी प्रकार की खनन प्रक्रिया स्वीकार नहीं की जाएगी। जानकारी के अनुसार मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जबलपुर द्वारा ग्राम पंचायत लूद के भवन में 7 मार्च को लोक सुनवाई का आयोजन किया गया था। इस लोक सुनवाई में मेसर्स द मध्यप्रदेश स्टेट माइनिंग कार्पोरेशन लिमिटेड भोपाल को दादरटोला, दादर बॉक्साइट ब्लॉक ऑफ मिनरल्स, जिसकी उत्खनन क्षमता 103870 टन प्रतिवर्ष के लिए लीज क्षेत्र 60.230 हेक्टेयर भूमि, वन कक्ष क्रमांक 1806, 1808 ग्राम पचामा के लिए सुनवाई किया जाना था। इसके लिए भारत सरकार पर्यावरण एवं वन जलवायु परिवर्तन मंत्रालय नई दिल्ली द्वारा राज्य स्तरीय विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति भोपाल का गठन किया गया था। यह सुनवाई समिति द्वारा पर्यावरणीय स्वीकृति के लिए किया जाना था। खनन परियोजना के विरोध में क्षेत्रीय जनता पहले से आंदोलनरत है। 12 फरवरी को पचामा दादर बॉक्साइट ब्लॉक में प्रस्तावित खनन के विरोध में रेंज ऑफिस चौक उकवा में ग्रामीणों ने चक्काजाम कर जनआंदोलन किया था। आंदोलन के दबाव के बाद प्रशासन ने 18 फरवरी को ग्राम पंचायत लूद में प्रस्तावित जनसुनवाई को स्थगित कर 6 मार्च तक टाल दिया था। इसके बाद 7 मार्च को पुन: जनसुनवाई आयोजित की गई, जिसका ग्रामीणों ने एकजुट होकर बहिष्कार कर दिया। जनसुनवाई के बहिष्कार के दौरान क्षेत्रीय विधायक संजय उइके, जिला पंचायत सदस्य मंशाराम मंडावी, विधायक प्रतिनिधि द्रोपकिशोर मेरावी, सामाजिक कार्यकर्ता बिरसा, ब्लॉक कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष संतोष बिसेन, बलवंत धुर्वे, ईश्वर खुसरे, उपसरपंच मेमराज उइके, संजय मेरावी, नंदकिशोर तिलगाम सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण और जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे। ये है मामला पचामा-दादर जंगल में प्रस्तावित बॉक्साइट खनन परियोजना की पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईई/ईआईए) रिपोर्ट पर गंभीर आपत्तियां दर्ज की गई हैं। जनसुनवाई से पहले सामने आए इन बिंदुओं पर आपत्ति लगाने के बाद भी सुनवाई नहीं हुई। जिसके कारण ग्रामीणों में आक्रोश उपजा है। ग्रामीणों के अनुसार जंगलों में उनके देवी-देवता वास करते हैं, जंगलों से उनकी आस्था जुड़ी हुई है। बावजूद इसके ईआईई/ ईआईए की रिपोर्ट में तथ्यों को दरकिनार किया जाना जंगलों में निवास करने वाली जनजातियों की आस्था पर हमला है। रिपोर्ट में अध्ययन क्षेत्र, वायु गुणवत्ता निगरानी, शोर स्तर, जल और मिट्टी परीक्षण सहित कई महत्वपूर्ण पहलुओं में तथ्यात्मक त्रुटियां और विसंगतियां हैं, जिससे परियोजना के वास्तविक प्रभाव को कम दर्शाने की कोशिश की गई है। इतना ही नहीं 10 किमी अध्ययन क्षेत्र में 24416.5 वन क्षेत्र, जिसमें वन्य प्राणी और औषधी पौधे भी है, इस पर खनन के प्रभाव को नहीं बताया गया है। नदी, डेम, कृषि भूमि पर इसका प्रभाव क्या होगा और उसे कैसे कम किया जाएगा? रिपोर्ट में इसका भी उल्लेखन नहीं किया गया है। इतना ही नहीं इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इंस्ट्रूमेंट इंजीनियरिंग (ईआईई) की रिपोर्ट में कोई भी वन्य प्राणी 10 किमी अध्ययन क्षेत्र के दायरे में नहीं होना बताया गया है। जबकि यह क्षेत्र बाघ, तेंदुआ, भालू, चीतल, सांभर, मोर, गौर, खरगोश जैसे वन्यप्राणियों का है। साथ ही रहवास क्षेत्र और वन भूमि 2552.2 वर्ग किमी क्षेत्र कान्हा-पेंच कॉरीडोर में आता है। प्रस्तावित खनन ब्लॉक की वनभूमि सहित अध्ययन क्षेत्र के भीतर समृद्ध जैव विविधता युक्त वन कक्षों में मिश्रित पेड़ों के सघन वन है। जिनकी स्थल गुणवत्ता घनत्व 0.5 से 0.7 है, जो भारतीय वन सर्वेक्षण की तुलना में अत्यंत सघन वन की श्रेणी में आता है। ऐसे घने वनों में स्तनधारी, सरीसृप, पक्षी, उभयचर, कीट, सूक्ष्मजीव का होना आवश्यक है और वैज्ञानिक रुप से सिद्ध भी है। बावजूद इसके ईआईई/ईआईए की रिपोर्ट में अध्ययन क्षेत्र में वन्य प्राणी का नहीं होना बताना गलत है। विधायक संजय उइके ने दिया समर्थन जिला कांग्रेस कमेटी बालाघाट के जिलाध्यक्ष एवं बैहर विधानसभा के विधायक संजय उइके ने ग्रामीणों के इस विरोध को अपना समर्थन दिया। उन्होंने कहा कि आदिवासी और ग्रामीण समुदाय का जंगल, जल और जमीन से गहरा संबंध है। वनाधिकार मान्यता कानून 2006 के तहत ग्राम सभाओं को सामुदायिक वन संसाधन के अधिकार दिए जाने का प्रावधान है। ऐसे में पहले ग्रामीणों के अधिकारों को सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया में शासन द्वारा ग्राम सभा की अनुमति लेना उचित नहीं समझा गया और ग्राम सभा के अधिकारों को दरकिनार कर कार्यवाही की जा रही है। यदि बिना वनाधिकार के खनन प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाता है तो यह आदिवासी और ग्रामीणों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन होगा। ग्राम सभा स्तर पर जारी है दावा प्रक्रिया ग्रामीणों ने बताया कि सामुदायिक वन संसाधन अधिकार के लिए दावा फाइल करने की प्रक्रिया ग्राम सभा स्तर पर जारी है और इसकी जानकारी प्रशासन को भी दी जा चुकी है। इसके बावजूद जनसुनवाई आयोजित करना ग्रामीणों के अधिकारों की अनदेखी है। ग्रामीणों ने स्पष्ट किया कि जब तक ग्राम सभा की अनुमति और वनाधिकार के बगैर क्षेत्र में खनन संभव नहीं है। आंदोलन तेज करने की चेतावनी ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों ने एक स्वर में कहा कि जब तक वनाधिकार कानून के तहत अधिकारों की मान्यता और ग्राम सभा की अनुमति नहीं मिलती, तब तक वे किसी भी जनसुनवाई या खनन प्रक्रिया में भाग नहीं लेंगे। इसी कारण 7 मार्च को आयोजित जनसुनवाई में क्षेत्रीय जनता शामिल नहीं हुई और उसका पूर्ण बहिष्कार किया गया। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि प्रशासन द्वारा वनाधिकार दावों का निराकरण किए बिना खनन प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई तो क्षेत्र में बड़ा आंदोलन किया जाएगा। भानेश साकुरे / 08 मार्च 2026