राज्य
10-Mar-2026
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- आदिवासियों के लिए अलग धर्म कोड की मांग भोपाल (ईएमएस)। मप्र में आदिवासी बड़ा वोट बैंक हैं। इसलिए इस वर्ग को साधने के लिए लगातार सियासी चालें चली जाती हैं। असी कड़ी में मप्र की सियासत में आदिवासियों की पहचान को लेकर एक नया मोर्चा खुल गया है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने अनूपपुर में आयोजित एक जनजातीय सम्मेलन में आदिवासियों के लिए अलग धर्म कोड की मांग उठाकर सत्ता के गलियारों में हलचल तेज कर दी है। सिंघार ने दो टूक कहा कि यदि आदिवासियों को अन्य धर्मों के तहत गिना जाता रहा, तो भविष्य में उनकी विशिष्ट पहचान और संवैधानिक अधिकार दोनों मिट जाएंगे। सिंघार के इस बयान पर मोहन सरकार के कैबिनेट मंत्री विश्वास सारंग ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कांग्रेस पर आदिवासियों को गुमराह करने और समाज को बांटने का आरोप लगाया। सारंग ने मांग की है कि जनगणना जैसी संवैधानिक प्रक्रिया में बाधा डालने और भ्रम फैलाने के जुर्म में सिंघार पर आपराधिक मामला दर्ज होना चाहिए। गौरतलब है कि आदिवासी सरना (पूजा) धर्म कोड तो मान्यता दिलाने के लिए मध्यप्रदेश के अलावा पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिसा, असम और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी आदिवासियों ने अपनी मुहिम चलाई है। इसमें आदिवासियों का कहना है कि जनगणना में आदिवासियों को अन्य श्रेणी की बजाय अलग आदिवासी धर्म कोड़ में शामिल किया जाए, ताकि उनकी विशिष्ट प्रकृति आधारित संस्कृति को संरक्षित किया जा सके। इस पर कुछ नेताओं ने दलील दी है कि आदिवासी हिंदू, इस्लाम या अन्य धर्मो को नहीं मानते। आदिवासी समुदाय प्रकृति का रक्षक होता और वर्षों से वृक्षों की पूजा करते हैं, जिसे वे एक अलग धार्मिक पहचान के रूप में मान्यता दिलाना चाहते हैं। इधर भाजपा से जुड़े आदिवासी नेताओं का कहना है कि यह आवश्यक नहीं हैं। यह एक संवेदनशील मुद्दा है। मौजूदा सरकार आदिवासियों के विकास के लिए लगातार काम कर रही है। ऐसे में उन्हें धर्मकोड जैसे विषय में डालकर विपक्षी दलों के नेता उन्हें गुमराह करने में लगे हुए है। लेकिन मध्यप्रदेश का आदिवासी जानता है कि कौन सा दल उनके हितों पर विशेष तौर पर ध्यान दे रहा है। खत्म हो सकते हैं वन अधिकार: सिंघार दरअसल, मप्र में आदिवासी हमेशा से राजनीति के केंद्र में रहते हैं। इसलिए राजनीतिक पार्टियों के लिए यह वर्ग प्राथमिकता में रहता है। इसी के मद्देनजर कांग्रेस का फोकस आदिवासियों पर है। ऐसे में सिंघार ने आदिवासियों को आगाह किया कि जनगणना के दौरान अपनी अलग पहचान दर्ज कराना अस्तित्व की लड़ाई है। उन्होंने जनता से सीधा संवाद करते हुए कहा कि मध्य प्रदेश से कम से कम 50 लाख आवेदन राष्ट्रपति के पास पहुंचने चाहिए ताकि दिल्ली को आदिवासियों की ताकत का अहसास हो। उनका तर्क है कि अगर आदिवासी समुदाय अन्य धर्मों में विलीन हो गया, तो आरक्षण और वन अधिकार जैसे सुरक्षा कवच कमजोर पड़ जाएंगे। अगर आदिवासियों की गिनती किसी और धर्म में होती रही, तो हमारी पहचान कैसे बचेगी? अगर पहचान मिट गई, तो आरक्षण, हक और जंगल के अधिकार भी खतरे में पड़ जाएंगे। आज चुप रहे, तो कल आपकी बात सुनने वाला कोई नहीं बचेगा। उमंग सिंघार ने कहा कि हम सब को मिलकर इस दिशा में पूरी सिद्दत के साथ लड़ाई लडऩी होगी। जिससे आदिवासियों का अपना धर्म कोड मिल सके। उन्होंने अगर आदिवासियों को किसी दूसरे धर्म में शामिल कर दिया गया, तो उनकी पहचान अधिकार और वन अधिकार खत्म हो सकते है। उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश में यह मांग काफी अरसे से की जा रही है, वे कई आदिवासी मंचों पर इस अहम विषय को उठा चुके है। लेकिन अब इस पर निर्णायक कदम उठाने पर ध्यान देना होगा। सिंघार ने कहा कि सत्ताधारी दल के लोग हमें वोट की खातिर आपस में लड़ाते है। प्रदेश में आदिवासी समुदाय की क्या स्थिति यह किसी से छिपी नहीं है और यदि हमें धर्म कोड नहीं दिया गया तो आने वाले समय में हमें अपनी पहचान बचाना मुश्किल हो जाएगा। ऐसे में सभी आदिवासी जनप्रतिनिधियों को अपनी जनता के बीच जाकर इस विषय को जनआवाज बनाया जाए और फिर दलगत राजनीति से ऊपर उठकर मामले को पूरे जोश-खरोश के साथ उठाना होगा। कांग्रेस की फूट डालो और आगे बढ़ो नीति: सारंग नेता प्रतिपक्ष के इस बयान पर सरकार के मंत्री विश्वास कैलाश सारंग ने आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि सिंघार ऐसा कह कर समाज को तोडऩे का काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनका यह कदम जनगणना की संवैधानिक प्रक्रिया में खलल डालने की कोशिश है। ऐसा करने पर इस मामले में आपराधिक मामला दर्ज होना चाहिए। सारंग ने कहा कि कांग्रेस पार्टी की हमेशा से यही नीति रही है कि फूट डालो और आगे बढ़ो। इस तरह की राजनीति राज्य के भोले-भाले आदिवासियों को बरगलाने के लिए की जा रही है। यह कृत्य समाज में विघटन पैदा करने जैसा है, जिसकी सार्वजनिक तौर पर निंदा होना चाहिए। विनोद/ 10 मार्च /2026