13-Mar-2026
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बीजिंग,(ईएमएस)। चीन में शी चिनफिंग की सरकार 56 जातीय समूहों को साझा राष्ट्रीय पहचान देने के उद्देश्य से एक नया कानून ला रही है। इस प्रस्तावित कानून का नाम “जातीय एकता और प्रगति को बढ़ावा देने वाला कानून” बताया जा रहा है, इस कानून को जल्द ही चीन की संसद नेशनल पीपल्स कांग्रेस के वार्षिक सत्र में मंजूरी मिल सकती है। शी सरकार का कहना है कि यह कानून देश में राष्ट्रीय एकता को मजबूत करेगा और आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को तेज करेगा, लेकिन मानवाधिकार संगठनों और विशेषज्ञों ने इसे अल्पसंख्यक समुदायों की संस्कृति और अधिकारों के लिए खतरा बताया है। इस कानून के तहत चीन की आधिकारिक भाषा मंदारिन को और अधिक महत्व दिया जाएगा। स्कूलों में मुख्य विषयों की पढ़ाई मंदारिन में ही कराने पर जोर होगा, जिससे अन्य जातीय भाषाओं का प्रयोग सीमित हो सकता है। साथ ही अलग-अलग जातीय समूहों के बीच विवाह को प्रोत्साहित किया जाएगा। यदि कोई व्यक्ति या संस्था जातीय या धार्मिक आधार पर ऐसी शादियों को रोकने की कोशिश करती है, तब उस गलत माना जाएगा। कानून में माता-पिता पर यह जिम्मेदारी भी डाली जाएगी कि वे अपने बच्चों को देश और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति प्रेम और निष्ठा सिखाएं। शिक्षा प्रणाली में बच्चों के भीतर पार्टी के प्रति वफादारी और राष्ट्रीय एकता की भावना विकसित करने पर विशेष जोर रहेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम सिनिसाइजेशन नीति को और मजबूत करेगा। इस नीति का उद्देश्य धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को मुख्यधारा की हान चीनी संस्कृति और कम्युनिस्ट पार्टी के मूल्यों के अनुरूप ढालना है। आलोचकों के अनुसार इससे अल्पसंख्यक समुदायों की अलग पहचान धीरे-धीरे कमजोर हो सकती है। चीन में कुल 56 आधिकारिक जातीय समूह हैं, जिनमें हान सबसे बड़ा समुदाय है। उइगर, तिब्बती और मंगोल जैसे कई अल्पसंख्यक समुदाय भी बड़ी संख्या में रहते हैं। सरकार का विशेष ध्यान शिनजियांग और तिब्बत जैसे क्षेत्रों पर है, जहां लंबे समय से तनाव और विरोध की घटनाएं होती रही हैं। उदाहरण के लिए, 2008 में ल्हासा में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे। वहीं 2009 में उरुमची में उइगर और हान समुदायों के बीच हिंसक झड़पों में लगभग 200 लोगों की मौत हुई थी। चीन सरकार का कहना है कि ऐसे घटनाक्रमों के कारण सख्त कदम उठाना जरूरी हो गया है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई संगठनों ने आरोप लगाया है कि शिनजियांग में उइगर मुस्लिमों पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए हैं। संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार समूहों का दावा है कि वहां बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत शिविरों में रखा गया। चीन इन केंद्रों को “पुनर्शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र” बताता है। रिपोर्ट्स के अनुसार उइगरों की धार्मिक गतिविधियों पर भी सीमाएं लगाई गईं और कई मस्जिदें बंद की गईं। तिब्बत में भी मठों पर कड़ा नियंत्रण है और बच्चों के लिए सरकारी स्कूलों में मंदारिन पढ़ना अनिवार्य किया गया है। इन नीतियों के कारण चीन की अल्पसंख्यक नीति पर अंतरराष्ट्रीय बहस लगातार जारी है। आशीष/ईएमएस 13 मार्च 2026