मनमोहन सिंह के समय घटाया गया मोदी के समय बढ़ाया गया नई दिल्ली (ईएमएस) । भारत के अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर को लेकर नया विवाद सामने आया है। अंतरराष्ट्रीय शोध संस्था ने पीटरसन इंस्टिट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स की रिपोर्ट में भारत के सकल घरेलू उत्पाद के आँकड़ों पर गड़बड़ियों का दावा किया गया है। भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर के आधिकारिक आँकड़ों को लेकर नया विवाद सामने आया है। अंतरराष्ट्रीय शोध संस्था के प्रकाशित शोध पत्र में दावा किया गया है। पिछले दो दशकों में भारत की आर्थिक वृद्धि दर को लेकर सुनयोजित तरीके से गलत आंकड़े पेश किए गए हैं। शोध पत्र का शीर्षक “भारत में बीस वर्षों के सकल घरेलू उत्पाद के गलत आकलन के नए प्रमाण” है। इसे अर्थशास्त्री अरविंद सुब्रमण्यम तथा अभिषेक आनंद तथा जोश फेलमन द्वारा तैयार की है। अरविंद सुब्रमण्यम भारत सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार रह चुके हैं। उन्होंने पहले भी जीडीपी के आँकड़ों पर सवाल उठाए थे। दो अलग-अलग अवधि अध्ययन के अनुसार वर्ष 2005 से 2011 के बीच भारत की आर्थिक वृद्धि दर को कम करके आंकने का है। उस समय आधिकारिक रूप से औसत वृद्धि दर लगभग 6.9 प्रतिशत बताई गई थी। शोधकर्ताओं के अनुसार वास्तविक वृद्धि दर इससे लगभग 1 से 1.5 प्रतिशत अधिक, करीब 8 से 8.5 प्रतिशत के आसपास थी। वहीं 2012 से 2023 के बीच स्थिति इसके उलट बताई गई है। अध्ययन के मुताबिक इस अवधि में आर्थिक वृद्धि दर को वास्तविक से अधिक दिखाया गया है। आधिकारिक आँकड़ों में औसत वृद्धि दर लगभग 6 प्रतिशत बताई गई, वहीं शोधकर्ताओं का अनुमान है कि वास्तविक वृद्धि दर करीब 4 से 4.5 प्रतिशत अनुमान लगाया गया है। शोध में कहा गया है, 2012 से 2019 के बीच वृद्धि दर के आकलन में अधिक अनुमान लगाया गया, जबकि कोरोना महामारी के दौरान 2020 से 2022 के बीच कुछ मामलों में वृद्धि दर को कम करके आंका गया। इसके बाद 2023 से 2025 के बीच फिर से अधिक अनुमान लगाए जाने की बात रिपोर्ट में कही गई है। आकलन के संभावित कारण अध्ययन में सकल घरेलू उत्पाद के आकलन से जुड़ी दो प्रमुख पद्धति का उल्लेख किया गया है। 1. संगठित क्षेत्र के आँकड़ों को असंगठित क्षेत्र मैं शामिल करने को गलत माना गया है। भारत की अर्थव्यवस्था में असंगठित या अनौपचारिक क्षेत्र का हिस्सा काफी बड़ा है।इसका योगदान लगभग 44 प्रतिशत माना जाता है। जीडीपी की गणना करते समय कई बार संगठित क्षेत्र के आँकड़ों का उपयोग असंगठित क्षेत्र के अनुमान के लिए किया गया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि दोनों क्षेत्रों की आर्थिक स्थिति अलग-अलग होती है। अध्ययन में कहा गया है, पिछले वर्षों में असंगठित क्षेत्र को कई बड़े झटके लगे हैं। 2016 में नोटबंदी के दौरान नकदी आधारित कारोबार पर विपरीत असर पड़ा। इसके बाद गुड्स और सर्विस टैक्स (जीएसटी) लागू होने से छोटे कारोबारियों को नई व्यवस्था के साथ तालमेल बैठाने में कठिनाई हुई। कॉविड-19 की महामारी का भी कारोबार पर गंभीर प्रभाव पड़ा। 2. वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर निकालने के लिए जिस तरह के आंकड़ों के उपयोग किए जाने वाले मूल्य समायोजन गुणांक में महँगाई के प्रभाव को समायोजित किया जाता है। उनको भी नए तरीके से गलत तरीके से जोड़ा गया है। नीतियों पर संभावित प्रभाव रिपोर्ट के अनुसार आर्थिक वृद्धि दर का आकलन वास्तविक स्थिति से अलग होने से इसका असर आर्थिक नीतियों और आंकड़ों पर पड़ा है। उदाहरण के लिए यदि वृद्धि दर अधिक दिखाई देती है, तो नीति निर्माता अर्थव्यवस्था की वास्तविक चुनौतियों को कम आँकते हैं। इससे ब्याज दर, निवेश, उपभोग और आर्थिक सुधारों से जुड़े निर्णय प्रभावित हुए हैं। शोध में कहा गया है, अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति कमजोर होने पर आँकड़े अपेक्षाकृत बेहतर बताने के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति का पता नहीं चलता है। इस अध्ययन के दावों पर अभी तक भारत सरकार या संबंधित आधिकारिक संस्थाओं की ओर से कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स में प्रकाशित शोध में दावा किया गया है। पिछले दो दशकों में भारत की आर्थिक वृद्धि दर के आकलन में व्यवस्थित रूप से गलत अनुमान लगाए हैं। दो अलग-अलग अवधियों में अलग स्थिति अध्ययन के अनुसार वर्ष 2005 से 2011 के बीच भारत की आर्थिक वृद्धि दर को कम करके आंका गया था। उस समय आधिकारिक रूप से औसत वृद्धि दर लगभग 6.9 प्रतिशत बताई गई थी, जबकि शोधकर्ताओं के अनुसार वास्तविक वृद्धि दर इससे लगभग 1 से 1.5 प्रतिशत अधिक, यानी करीब 8 से 8.5 प्रतिशत के आसपास हो सकती थी। वहीं 2012 से 2023 के बीच स्थिति इसके उलट बताई गई है। अध्ययन के मुताबिक इस अवधि में आर्थिक वृद्धि दर को वास्तविक स्थिति से अधिक दिखाया गया। जहाँ आधिकारिक आँकड़ों में औसत वृद्धि दर लगभग 6 प्रतिशत बताई गई, वहीं शोधकर्ताओं का अनुमान है कि वास्तविक वृद्धि दर करीब 4 से 4.5 प्रतिशत के आसपास रही होगी। शोध में यह भी कहा गया है कि 2012 से 2019 के बीच वृद्धि दर के आकलन में अधिक अनुमान लगाया गया, जबकि कोरोना महामारी के दौरान 2020 से 2022 के बीच कुछ मामलों में वृद्धि दर को कम करके आंका गया। इसके बाद 2023 से 2025 के बीच फिर से अधिक अनुमान लगाए जाने की संभावना जताई गई है।