- मौजूदा एलपीजी संकट के बीच चर्चाओं में आया गांव जबलपुर, (ईएमएस)। देश में समय-समय पर रसोई गैस की किल्लत, बढ़ती कीमतें और आपूर्ति में देरी आम लोगों के लिए चिंता का कारण बनती रही हैं। मौजूदा ऊर्जा संकट और वैश्विक हालात के बीच जहां शहरों में एलपीजी सिलेंडर की उपलब्धता और कीमतों को लेकर बेचैनी देखी जा रही है, वहीं जबलपुर जिले का एक छोटा सा गांव इस चुनौती के बीच आत्मनिर्भरता की मिसाल बनकर उभरा है। जिले का बंदरकोला गांव आज बायोगैस मॉडल के कारण चर्चा में है। यहां बड़ी संख्या में घरों ने गोबर गैस प्लांट लगाकर अपनी रसोई को एलपीजी पर निर्भर रहने से मुक्त कर लिया है। 75 प्रतिशत घरों में जलती है बायोगैस की लौ… करीब 250 घरों वाले बंदरकोला गांव में लगभग 50 से 75 प्रतिशत परिवारों ने अपने घरों के पीछे बायोगैस प्लांट स्थापित किए हैं। इन प्लांटों में पशुओं के गोबर और जैविक अपशिष्ट से गैस तैयार होती है, जो पाइपलाइन के जरिए सीधे रसोई तक पहुंचती है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें अब सिलेंडर बुकिंग, सब्सिडी या आपूर्ति में देरी की चिंता नहीं रहती। रोजमर्रा का खाना स्थानीय संसाधनों से तैयार गैस पर बन रहा है। ऊर्जा संकट में राहत का मॉडल… जब देश के कई हिस्सों में एलपीजी की आपूर्ति प्रभावित होती है या कीमतों में बढ़ोतरी होती है, तब बंदरकोला जैसे गांवों में जीवन सामान्य बना रहता है। ग्रामीणों का मानना है कि बायोगैस ने उन्हें बाहरी ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता से काफी हद तक मुक्त कर दिया है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह मॉडल ग्रामीण ऊर्जा सुरक्षा का मजबूत विकल्प साबित हो सकता है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां पशुधन पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। पर्यावरण और खेती को भी फायदा … बायोगैस का उपयोग केवल रसोई तक सीमित नहीं है। प्लांट से निकलने वाली स्लरी (अवशेष) जैविक खाद के रूप में खेतों में उपयोग की जाती है। इससे रासायनिक खाद पर खर्च कम होता है और मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ती है। पर्यावरण की दृष्टि से भी यह पहल लाभकारी है। गोबर और जैविक कचरे का नियंत्रित उपयोग होने से खुले में सड़ने से होने वाला प्रदूषण कम होता है और कार्बन उत्सर्जन घटाने में मदद मिलती है। महिलाओं को मिली बड़ी राहत… गांव की महिलाओं के लिए यह बदलाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण साबित हुआ है। पहले सिलेंडर भरवाने और लाने में समय व श्रम लगता था। अब घर के पास ही गैस उपलब्ध होने से समय की बचत हो रही है। स्थानीय महिलाओं का कहना है कि बायोगैस से खाना बनाना आसान है और धुआं भी नहीं होता, जिससे स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर पड़ा है। प्रशासन और अन्य गांवों के लिए प्रेरणा… बंदरकोला का यह मॉडल अब आसपास के गांवों के लिए भी प्रेरणा बन रहा है। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पंचायत स्तर पर योजना बनाकर सब्सिडी और तकनीकी सहयोग दिया जाए तो यह मॉडल बड़े स्तर पर लागू किया जा सकता है। मौजूदा ऊर्जा संकट के दौर में जब पारंपरिक ईंधनों की कीमत और उपलब्धता दोनों चुनौती बन रहे हैं, तब जबलपुर का यह गांव दिखा रहा है कि स्थानीय संसाधनों के सही उपयोग से आत्मनिर्भरता संभव है। सुनील साहू / शहबाज / 19 मार्च 2026