चेन्नई,(ईएमएस)। तमिलनाडु की राजनीति में अभिनेता से नेता बने थलपति विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम (टीवीके) ने बड़ा दांव खेलकर आगामी विधानसभा चुनाव अपने दम पर लड़ने का फैसला किया है। विजय और उनकी पार्टी ने साफ किया है कि वे किसी भी गठबंधन का हिस्सा नहीं बनने वाले है। इस फैसले के पीछे विजय की “जनता की राजनीति” वाली छवि को मजबूत करने की रणनीति मानी जा रही है। विजय ने अफवाहों को खारिज करते हुए कहा कि उनकी पार्टी सिर्फ “लोगों की टीम” है, न कि किसी राजनीतिक गठबंधन का हिस्सा। इस बीच एक बड़ा सस्पेंस तब पैदा हुआ जब टीवीके महासचिव आधव अर्जुन ने दावा किया कि एक “गुमनाम पार्टी” ने विजय को 50 से 90 सीटों का ऑफर दिया था, यहांतक कि मुख्यमंत्री पद की पेशकश भी की गई। हालांकि, उन्होंने उस पार्टी का नाम नहीं बताया। अर्जुन के बयान में “दिल्ली के आगे झुकने” वाली टिप्पणी से संकेत मिलता है कि यह इशारा केंद्र की राजनीति, खासकर बीजेपी की ओर हो सकता है, लेकिन इसकी पुष्टि नहीं है। विजय का यह ऑफर ठुकराना उनकी राजनीतिक रणनीति को दिखाता है, वे पद या समझौते से ज्यादा जनसमर्थन पर भरोसा दिखाना चाहते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या अपने दम पर चुनाव लड़ना उनके लिए फायदेमंद साबित होगा? तमिलनाडु की राजनीति परंपरागत रूप से दो बड़े दलों—द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) और एआईएडीएमके के बीच केंद्रित रही है। वर्तमान में राज्य के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन की डीएमके सत्ता में है, और विजय की राजनीति सीधे तौर पर उनके खिलाफ मानी जा रही है। हालांकि विजय की रैलियों में भारी भीड़ जुट रही है, जैसे करूर रैली, जो उनके जनाधार का संकेत देती है, लेकिन विजय को इस भीड़ को वोटों में बदलना एक बड़ी चुनौती होगी। बिना गठबंधन के चुनाव लड़ने का मतलब है कि टीवीके को हर सीट पर मजबूत संगठन, उम्मीदवार और संसाधन खड़े करना होगा, जो एक नई पार्टी के लिए कठिन काम है। इसके अलावा, विजय व्यक्तिगत और कानूनी चुनौतियों से भी घिरे हुए हैं। 2025 में करूर रैली में भगदड़ की घटना में 41 लोगों की मौत के मामले में जांच चल रही है। साथ ही आयकर मामलों और उनके निजी जीवन—पत्नी संगीता के साथ तलाक विवाद ने भी उनकी छवि पर असर डाला है। चुनाव से ठीक पहले कोर्ट में पेशी भी राजनीतिक माहौल को प्रभावित कर सकती है। 2026 विधानसभा चुनाव में उनका मुकाबला मुख्य रूप से द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के नेतृत्व वाले गठबंधन और अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम से होगा। स्टालिन के नेतृत्व में डीएमके मजबूत स्थिति में है, जबकि एआईएडीएमके आंतरिक चुनौतियों से जूझ रही है। विजय के सामने दो मॉडल हैं। पहला, चिरंजीवी मॉडल जहां नई पार्टी को अच्छा वोट शेयर मिलता है, लेकिन वह सीटों में तब्दील नहीं हो पाता। 2009 में उनकी पार्टी को 16 प्रतिशत वोट मिले, पर सीटें बहुत कम आईं, और अंततः उन्हें समझौता करना पड़ा। यह रास्ता विजय को सीमित राजनीतिक प्रभाव तक ही रोक सकता है। दूसरा, पवन कल्याण मॉडल जहां गठबंधन की राजनीति के जरिए सत्ता में भागीदारी हासिल की जाती है। पवन कल्याण ने तेलुगु देशम पार्टी के साथ मिलकर सत्ता में जगह बनाई और डिप्टी सीएम बने। विजय के लिए चुनौती यह है कि वे अपने दम पर वोट को सीटों में बदलें या गठबंधन का रास्ता अपनाएं। उनका निर्णय ही तय करेगा कि वे तमिलनाडु में सत्ता के नए केंद्र बनेंगे या सिर्फ एक और लोकप्रिय लेकिन असफल राजनीतिक प्रयोग। तमिलनाडु की राजनीति में सिनेमा का प्रभाव ऐतिहासिक रूप से गहरा रहा है। एम. जी. रामचंद्रन और जे. जयललिता जैसे दिग्गजों ने फिल्मी लोकप्रियता को सीधे सत्ता में बदला। इसी परंपरा में अब विजय की एंट्री ने 2026 के चुनाव को दिलचस्प बना दिया है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के नेतृत्व में एम. के. स्टालिन मजबूत स्थिति में हैं, जबकि अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम आंतरिक खींचतान से जूझ रही है, भले ही ई. पलानीस्वामी और ओ. पन्नीरसेल्वम जैसे नेता सक्रिय हों। इसके बाद विजय की पार्टी के कारण त्रिकोणीय मुकाबले की स्थिति बन रही है। विजय फिलहाल आक्रामक तेवर अपनाते हुए स्टालिन सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे हैं और खुद को मुख्य चुनौती के रूप में पेश कर रहे हैं। लेकिन उनकी असली परीक्षा यह होगी कि वे अपने वोट शेयर को सीटों में बदल पाते हैं या नहीं। आखिरकार, विजय के पास विकल्प साफ हैं—या अपने दम पर लड़कर जोखिम उठाएं (चिरंजीवी मॉडल), या रणनीतिक गठबंधन कर सत्ता में हिस्सेदारी सुनिश्चित करें (पवन कल्याण मॉडल उनका फैसला ही तय करेगा कि वे तमिलनाडु की राजनीति में नई धुरी बनते या एक और असफल प्रयोग साबित होते है। आशीष दुबे / 19 मार्च 2026