पिथौरागढ़(ईएमएस)। दुनिया जहां एक ओर पश्चिम एशिया में ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच छिड़ी भीषण जंग और बदलते वैश्विक गठबंधनों को देख रही है, वहीं दूसरी ओर हिमालय की दुर्गम ऊंचाइयों पर कूटनीति की एक नई इबारत लिखी जा रही है। भारत और चीन के बीच पिछले छह वर्षों से बंद पड़ा रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण लिपुलेख दर्रा इस साल जून से फिर से सक्रिय होने जा रहा है। सीमावर्ती गांवों में इस खबर से उम्मीद की नई किरण जागी है और स्थानीय व्यापारियों के चेहरों पर रौनक लौट आई है। समुद्र तल से लगभग 17,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित लिपुलेख दर्रा भारत और तिब्बत के बीच व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का सदियों पुराना केंद्र रहा है। 1962 के युद्ध के बाद बंद हुए इस मार्ग को 1992 में दोबारा खोला गया था और यह 2019 तक सुचारू रूप से चलता रहा। हालांकि, 2020 में कोविड-19 महामारी और सीमाई तनाव के चलते इसे बंद कर दिया गया था। अब छह साल के लंबे अंतराल के बाद विदेश मंत्रालय से हरी झंडी मिलने के बाद पिथौरागढ़ जिला प्रशासन ने तैयारियां तेज कर दी हैं। जिलाधिकारी आशीष कुमार भटगाईं ने संबंधित विभागों के साथ बैठक कर बुनियादी ढांचे को दुरुस्त करने के निर्देश जारी किए हैं। इस बार का व्यापार सीजन ऐतिहासिक बदलावों का गवाह बनेगा। साल 2020 में इस क्षेत्र में सीमा सड़क संगठन द्वारा निर्मित पक्की सड़क ने कनेक्टिविटी की सूरत बदल दी है। अब व्यापारियों को पुराने दौर की तरह खच्चरों और भेड़ों पर सामान लादकर हफ्तों का सफर तय नहीं करना होगा। आधुनिक सड़क मार्ग उपलब्ध होने से व्यापार न केवल तेज होगा, बल्कि लागत में कमी आने से स्थानीय कारोबारियों को सीधा आर्थिक लाभ मिलेगा। जून से सितंबर तक चलने वाले इस व्यापार सीजन को मौसम की अनुकूलता के आधार पर आगे भी बढ़ाया जा सकता है। हालांकि, इस फैसले के भू-राजनीतिक निहितार्थ भी गहरे हैं। एक तरफ जहां यह कदम भारत और चीन के बीच संवाद और जमीनी सहयोग की बहाली का संकेत माना जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ नेपाल इस घटनाक्रम से कुछ असहज नजर आ रहा है। कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख को लेकर नेपाल के अपने दावे इस मुद्दे को संवेदनशील बना देते हैं। बावजूद इसके, हिमालय की इन चोटियों पर व्यापारिक गतिविधियों का दोबारा शुरू होना क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था और द्विपक्षीय संबंधों के लिए एक सकारात्मक मोड़ साबित हो सकता है। वीरेंद्र/ईएमएस/20मार्च2026