राज्य
20-Mar-2026
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- हाईकोर्ट ने सबूत के बिना परंपरा का दावा किया खारिज जबलपुर, (ईएमएस)। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश विवेक जैन की एकलपीठ ने एक मामले में सुनवाई के बाद दिए गए अपने अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि महज आदिवासी परंपरा का हवाला देकर किसी महिला को पति की संपत्ति या नौकरी में अधिकार नहीं मिल सकता, ऐसे दावे के लिए ठोस और प्रमाणिक सबूत जरूरी हैं। एकलपीठ ने शहडोल निवासी महिला की याचिका खारिज करते हुए यह स्पष्ट किया कि बिना प्रमाण के बहुविवाह की परंपरा को मान्यता नहीं दी जा सकती। शहडोल निवासी मुन्नी बाई की आर से उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर दावा किया गया था कि याचिकाकता भगत सिंह की दूसरी पत्नी है। वह पाव जनजाति से है और उसके समाज में बहुविवाह की परंपरा मान्य है। ऐसे में उस पर हिंदू विवाह अधिनियम लागू नहीं होता, लिहाजा पति की मृत्यु के बाद उसे पति की संपत्ति में हिस्सा और नौकरी से जुड़े लाभ दिए जाएं। मामले में मृतक की पहली पत्नी फूलमति पाव की ओर से अधिवक्ता किशोरी लाल पाण्डेय ने याचिका का विरोध करते हुए फूलमती को मृतक की एकमात्र वैध पत्नी बताते हुए कहा कि सरकारी रिकॉर्ड (सेवा अभिलेख) में भी वही पत्नी के रूप में दर्ज हैं। इसके अलावा एलआईसी की ओर से अधिवक्ता विजय कुमार सोनी व कोल माइन्स प्रोविडेंट फंड की ओर से अधिवक्ता तकमील नासिर , यूनियन बैंक की ओर से अधिवक्ता राजस पोहनकर ने भी अपना पक्ष रखा। सभी पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद एकलपीठ ने अपने फैसले में कहा कि “केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि किसी जनजाति में बहुविवाह की परंपरा है। इसके लिए ठोस साक्ष्य, सामाजिक मान्यता या न्यायिक आधार होना आवश्यक है।” न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर पाई। न ही कोई मान्य दस्तावेज, परंपरा का प्रमाण या पूर्व न्यायिक निर्णय प्रस्तुत किया गया। इसी आधार पर एकलपीठ ने याचिकाकर्ता महिला को उत्तराधिकार प्रमाण पत्र देने से इनकार कर उसका संपत्ति में हिस्सा और नौकरी से जुड़े लाभों का दावा भी खारिज कर दिया। अजय पाठक / मोनिका / 20 मार्च 2026/ 03.04