16 मार्च 2026 को लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी विभिन्न मुद्दों को लेकर हंगामा मचाते रहे। भारत अमेरिका व्यापार समझौता, संवैधानिक संस्थाओं पर बार-बार हमले एलपीजी संकट पर आदि मुद्दों पर राहुल के रवैया को अराजक बतलाया है। निश्चित रूप से उनके कुछ मुद्दे विचारणीय हैं जिन पर देशव्यापी विचार-विमर्श व चर्चा होनी चाहिए। राहुल द्वारा लगाए गए आरोपों पर निष्पक्ष जांच की जरूरत है, भले ही राहुल के तरीकों से असहमति क्यों न हो। लेकिन लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि ‘‘असहमति’’ को ‘‘सहमति’’ के साथ ‘‘संतुलित’’ किया जाए, न कि कुतर्क, व्यक्तिगत हमले या ‘‘इतिहास’’ के सहारे दबाया जाए। दुर्भाग्यवश वर्तमान राजनीति में ‘‘गुण-दोष’’ और ‘‘तर्क’’ का स्थान ‘‘कुतर्क’’ ने ले लिया है।इसी बीच अचानक एक नया ‘घमासान’ शुरू हो गया। मीडिया में बहस का केंद्र ‘‘एलओपी’’ (Leader of Opposition) की जगह ‘‘एलपीजी’’ (Liquefied Petroleum Gas) ने ले ली। ‘‘वैश्विक संकट का असरः ईरान-अमेरिका-इजराइल’’ ईरान-अमेरिका-इजराइल युद्ध के कारण खाड़ी क्षेत्र में तेल और गैस आपूर्ति निश्चित रूप से बाधित हुई है। ‘‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’’ प्रभावित होने से भारत की एलपीजी आयात पर गंभीर असर पड़ा है। भारत अपनी कुल एलपीजी खपत का लगभग 60% आयात करता है, जिसमें 85-90% मध्य पूर्व से आता है। युद्ध के चलते शिपमेंट्स प्रभावित हुईं, जिससे कीमतों में बढ़ोतरी हुई (दिल्ली में 14.2 किलो घरेलू सिलेंडर की कीमत 7% बढ़कर 913 रुपये हो गई) और कुछ क्षेत्रों में वितरण में देरी की खबरें भी आईं। एटीएफ का बेस प्राइस बढ़ा है। विमानन कंपनियों ने फ्यूल सरचार्ज लगा दिया है। ‘‘ सरकार की त्वरित प्रतिक्रिया और उपाय’’ । यद्यपि सरकार ने त्वरित कदम उठाए। पेट्रोलियम मंत्रालय ने 8 मार्च 2026 को एलपीजी कंट्रोल ऑर्डर जारी किया, जिसमें सभी रिफाइनरियों को अधिकतम एलपीजी उत्पादन के निर्देश दिए गए। परिणामस्वरूप घरेलू उत्पादन में 30% से 35% तक की वृद्धि हुई। घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता दी गई, जबकि व्यावसायिक उपयोगकर्ताओं (रेस्तरां, होटल) के लिए पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) की ओर बदलने की अपील की गई। सरकार ने स्पष्ट कहा घरेलू स्तर पर कोई कमी नहीं है। आपूर्ति वैकल्पिक स्रोतों (अमेरिका, नॉर्वे, रूस, कनाडा, अल्जीरिया) से बढ़ाई जा रही है और काला बाजारी-होर्डिंग पर सख्ती से नकेल कसी जा रही है। ‘‘ ई-केवाईसी संशोधनः बुकिंग में नई व्यवस्था ’’ सरकार ने एलपीजी बुकिंग को और पारदर्शी बनाने के लिए ई-केवाईसी (Aadhar आधारित बायोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन) को अनिवार्य किया है। पेट्रोलियम मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि यह केवल उन उपभोक्ताओं के लिए है जिन्होंने पहले ई-केवाईसी नहीं किया है। यदि आप पहले कर चुके हैं (गैर-PMUY उपभोक्ता), तो दोबारा नहीं करना है। जिन उपभोक्ताओं का अंतिम रिफिल जून 2025 से पहले का है, उन्हें ई-केवाईसी पूरा करने तक सिलेंडर नहीं मिलेगा। ये उपाय डुप्लिकेट कनेक्शन रोकने, सब्सिडी लीकेज रोकने और ब्लैक मार्केटिंग पर अंकुश लगाने के लिए है। ऑनलाइन बुकिंग को बढ़ावा दिया जा रहा है, और डिलीवरी ऑथेंटिकेशन कोड (क्।ब्द्ध कवरेज 53% से बढ़ाकर 72% किया गया है। ‘‘ होर्डिंग पर सख्त कार्रवाई ’’ प्रशासन एवं गैस एजेंसी कंपनियों ने देश के विभिन्न हिस्सों में बड़े पैमाने पर छापेमारी की। 16 मार्च 2026 तक 12,000 से अधिक छापे मारे गए और 15,000 से ज्यादा एलपीजी सिलेंडर जब्त किए गए। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, केरल, गोवा, जम्मू-कश्मीर, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में प्रमुख कार्रवाई हुई। ये कार्रवाईयां आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत हो रही है, ताकि पैनिक बाइंग और ब्लैक मार्केटिंग रोकी जा सके। ‘‘ संकट की वास्तविकताः अफवाहें या पैनिक बाइंग’ ’? मुख्यधारा का मीडिया जो अब तथाकथित ‘गोदी मीडिया’ के नाम से जाना जाता है, आश्चर्यजनक रूप से लंबी-चौड़ी लाइनों की तस्वीरें दिखा रहा है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, पुणे, बेंगलुरु और गोवा जैसे शहरों में गैस एजेंसियों के बाहर भीड़ दिखाई दे रही है। परंतु सवाल उठता है, यह संकट कितना वास्तविक है? या अफवाहों और पैनिक बाइंग का? सामान्य प्रक्रिया यही है कि जब सिलेंडर खाली होता है, तभी रिफिल कराया जाता है। दो-तीन सिलेंडर रखने वाले उपभोक्ता भी तभी जाते हैं जब जरूरत पड़ती है। इसलिए लंबी लाइनों के बावजूद ‘संकट’ को ‘‘अफवाह’’ बताना तथ्यों से ‘‘अनाचार’’ है। सरकार का सूचना तंत्र लगातार आश्वासन दे रहा है कि निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित की जा रही है। सवाल यह है कि आपूर्ति श्रृंखला टूट कहां रही है? सरकार को स्थानीय वितरण नेटवर्क, ट्रांसपोर्ट और एजेंटों की भूमिका की जांच करनी चाहिए। ‘‘ एलपीजी संकट वि. एलओपी मुद्देः मीडिया और संसद में बदलाव’’ ‘‘एलपीजी’’ का यह संकट ‘‘एलओपी’’ के मुद्दों से कहीं बड़ा घमासान मचा रहा है। राहुल गांधी और विपक्ष के अन्य मुद्दे (संसदीय कार्यवाही, बोलने का अधिकार आदि) मीडिया से ‘‘गायब’’ होकर ‘‘नैपथत्य’’ मे चले गए हैं। अब संसद में भी एलपीजी मूल्यवृद्धि और आपूर्ति पर ही हंगामा हो रहा है। लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन जब वैश्विक संकट (युद्ध के कारण) रसोई तक पहुंच जाता है, तो प्राथमिकता बदल जाती है। ‘‘ निष्कर्ष और सुझाव’ ’ देश के 33 करोड़ से अधिक घरेलू उपभोक्ताओं की रसोई को कोई संकट नहीं पहुंचना चाहिए यह सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। पैनिक बाइंग रोकने, काला बाजारी पर अंकुश लगाने और वैकल्पिक ऊर्जा (इंडक्शन, PNG) को बढ़ावा देने की जरूरत है। मीडिया को जिम्मेदारी दिखानी चाहिए। तथ्यों पर आधारित रिपोर्टिंग करनी चाहिए। आखिर भाजपा के लाखों कार्यकर्ता आज हैं कहां? वे क्यों नहीं जनता के बीच जाकर समस्या का समाधान निकालने में सहायक हो रहे हैं? सरकार को आपूर्ति श्रृंखला मजबूत करने के साथ-साथ जनता को सही जानकारी देकर भ्रम दूर करना चाहिए। तभी ‘‘एलपीजी बनाम एलओपी’’ का यह घमासान शांत होगा और देश की प्रगति पर ध्यान केंद्रित रहेगा। ईएमएस/21/03/2026