सरायकेला(ईएमएस)।सरायकेला-खरसावां जिले के गम्हरिया के निवासी सुभाष महतो इंटरनेट के सहायता से मोती उत्पादन कर के अपनी अलग पहचान बना रहे हैं। सुभाष महतो अपने छोटे से डोभा में करीब 20 हजार मोतियों का उत्पादन कर रहे हैं। इसमें करीब पांच लाख की लागत आयी है, जिससे करीब 45-50 लाख की मुनाफे की उम्मीद है।सुभाष द्वारा उत्पादित मोतियां की मांग कोलकाता से लेकर हैदराबाद तक है।जिले के मत्स्य विभाग की ओर से भी सुभाष को तकनीकी सहयोग दिया जा रहा है।सुभाष महतो मोती की खेती कर अपनी अलग पहचान बना रहे हैं।चामारू पंचायत के रंगामाटिया गांव के सुभाष महतो द्वारा उत्पादित मोती की मांग कोलकाता से लेकर हैदराबाद के बाजारों तक है।अपने छोटे से डोभा में करीब 20 हजार सीप डाले हैं।अगले कुछ माह में सीप के भीतर मोती तैयार हो जाएगा। इसमें करीब पांच लाख की लागत आयी है, जिससे करीब 40-45 लाख की मुनाफे की उम्मीद है।सुभाष महतो के मोती की खेती से जुड़ने का किस्सा भी काफी रोचक है। करीब नौ साल पहले मोबाईल पर वीडियो देखने के दौरान उनकी नजर मोती की खेती पर पड़ी।तभी युट्यूब पर मोती की खेती के अलग अलग वीड़ियो देख सुभाष महतो के मन में भी मोती की खेती करने की इच्छा जागृत हुई।सुभाष बताते है कि इंटरनेट के माध्यम से उन्हें सीप मोती उत्पादन किये जाने की जानकारी मिली।इसके बाद इंटरनेट के माध्यम से उन्होंने मोती उत्पादन का प्रशिक्षण लेने की इच्छा जतायी, जिसे प्रशिक्षकों ने स्वीकार कर लिया। उसी वर्ष ही कोलकाता के पास स्थित मेचोदा नामक जगह पर मोती की खेती पर 15 दिनों का प्रशिक्षण लिया। फिर अगले ही साल मोती की खेती शुरु कर दी।सुभाष महतो ने बताया कि वर्ष 2017 में उन्होंने पहली बार मोती की खेती शुरु की।उस वक्त करीब 1.30 लाख रुपये खर्च कर सुभाष ने आठ हजार सीप मोती का उत्पादन किया था।मोती की खेती में मिली सफलता से लवरेज सुभाष ने मोती की खेती के दायरो को बढ़ाया।इस साल तालाब में 20 हजार सीप छोड़ कर मोती की खेती कर रहे है। उन्होंने बताया कि मोती तैयार होने में 12 से 14 माह का समय लगता है।जिला मत्स्य विभाग भी मोती की खेती को बढ़ावा देने के लिये सुभाष महतो को तकनीकी सहयोग कर रही है।मोती सामान्यतः समुद्र में रहने वाले घोंघा प्रजाति के एक छोटे से प्राणी सीप (झिनुक) के पेट में बनते हैं।मोती उत्पादन के लिए सीप (झिनुक) समेत अन्य आवश्यक कच्चा पाउडर व अन्य सामग्री कोलकाता से ही लाते है। सुभाष महतो ने बताया कि कोलकाता से सीप लाने के बाद उसे एक सप्ताह तक डोभा में पानी सूट करने के लिए छोड़ते है।इसके बाद उसे बाहर निकालकर सर्जरी कर मोती का बीजा को सीप में डाला जाता है। सीप से गोल आकार की मोती के साथ साथ भगवान गणेश, शंकर, मां दुर्गा के सेप में मोती उत्पादित करते है।इसके लिए कच्चा पाउडर को लॉकेट रूप देकर सांचा से मोती का बीजा तैयार कर मोती बनने के लिए चीप में डाला जाता है। उसके बाद कुछ दिन तक एंटी बाइटिक पानी में रखा जाता है, फिर उसे पानी में छोड़ दिया जाता है।ऐसी अवस्था में सीप में डाले गये बीजा में एक विशेष पदार्थ की परत चढ़ती रहती है। यह विशेष पदार्थ कैल्शियम कार्बोनेट होता है, जोकि उस जीव के अंदर पैदा होता है। धीरे-धीरे यह एक सफेद रंग के चमकीले गोल आकार का पत्थर जैसा पदार्थ बन जाता है, जिसे मोती कहते हैं। माना जाता है कि प्राकृतिक रूप से तैयार मोतियों के उपयोग से मन और दिमाग शांत रहता है।सुभाष महतो द्वारा उत्पादित मोती की मांग कोलकाता से लेकर हैदराबाद तक है। कोलकाता व हैदराबाद से व्यापारी उनके गांव पहुंच कर मोती की खरीदारी कर ले जाते है। साथ जमशेदपुर के व्यापारी भी इसकी खरीदारी कर लेते है। गोल मोती 50 से सौ रुपये में बिक जाती है, वहीं अलग अलग मूर्तियों वाली मोती 500 से 600 रुपये प्रति पीस की दर से बिक्री होती है। कर्मवीर सिंह/22मार्च/26