नई दिल्ली,(ईएमएस)। राज्यसभा में केंद्र की मोदी सरकार की ओर से प्रस्तावित केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) विधेयक को पेश करने की प्रक्रिया प्रभावित हुई। दरअसल विपक्षी दलों ने संसदीय नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाकर कड़ा विरोध जताया। तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व में कई विपक्षी दलों ने दावा किया कि बिल की प्रति सदस्यों को निर्धारित 48 घंटे पहले उपलब्ध नहीं हुई, इस कारण पेशी को रोका गया। तृणमूल कांग्रेस सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने मुद्दा उठाकर केंद्र सरकार से संसदीय प्रक्रियाओं का पालन सुनिश्चित करने की मांग की। विरोध के बीच पार्टी के सांसदों ने वॉकआउट भी किया। कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और सीपीआई(एम) ने भी मुद्दे पर सरकार का विरोध कर जल्दबाजी में कानून पारित करने के खिलाफ चेतावनी दी। विपक्ष को हमलावार होता देख केंद्र सरकार ने फिलहाल सीएपीएफ बिल को पेश करने का फैसला टाल दिया। मोदी सरकार के वरिष्ठ मंत्री ने स्वीकार किया कि कुछ मतभेद सामने आए हैं, जिन्हें दूर करना आवश्यक है। इस बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्षी नेताओं के साथ बैठक कर सहमति बनाने की कोशिश की। संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू भी बैठक में शामिल रहे। वहीं, विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने अन्य दलों के नेताओं के साथ अलग से रणनीति बैठक की। क्या है सीएपीएफ बिल? प्रस्तावित सीएपीएफ बिल का उद्देश्य देश के 5 प्रमुख केंद्रीय सुरक्षा बलों सीआरपीएफ, बीएसएफ, आईटीबीपी, एसएसबी और सीआईएसएफ के लिए एकीकृत प्रशासनिक ढांचा तैयार करना है। फिलहाल ये सभी बल अलग-अलग कानूनों के तहत संचालित होते हैं। बिल के तहत भर्ती, प्रमोशन, डेपुटेशन और सेवा शर्तों को एक समान बनाने का प्रस्ताव है। इसमें आईपीएस अधिकारियों की वरिष्ठ पदों पर नियुक्ति को औपचारिक रूप देने की बात भी शामिल है। बिल के अनुसार, इंस्पेक्टर जनरल (आईजी) स्तर के 50 प्रतिशत पद आईपीएस अधिकारियों के जरिए भरे जाएंगे, जबकि एडिशनल डायरेक्टर जनरल (एडीजी) स्तर पर यह संख्या कम से कम 67 प्रतिशत होगी। शीर्ष पदों स्पेशल डायरेक्टर जनरल (एसडीजी) और डायरेक्टर जनरल (डीजी) पर पूरी तरह आईपीएस अधिकारियों की नियुक्ति का प्रस्ताव है। केंद्र सरकार के इस प्रावधान को लेकर विवाद गहराया हुआ है, क्योंकि सीएपीएफ के भीतर से ही अधिकारियों के अवसर सीमित होने की आशंका है। आशीष दुबे / 24 मार्च 2026