लेख
25-Mar-2026
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इजरायल- अमेरिका ने ईरान के ऊपर एक साथ आक्रमण किया। ईरान पर इस युद्ध का जो असर पडना था, वह पड़ रहा है। अमेरिका और इजरायल के ऊपर युद्ध के जो परिणाम सामने आने थे, वह भी सामने आ रहे हैं। भारत इन दो पाटों के बीच में पिसता हुआ नजर आ रहा है। वैश्विक निवेश फर्म गोल्डमैन ने भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर जो रिपोर्ट जारी की है, वह चिंता बढ़ाने वाली है। रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से भारत की जीडीपी में कमी आने तथा महंगाई बढ़ने की चेतावनी दी गई है। भारतीय अर्थ व्यवस्था में सबसे बड़ी गड़बड़ी डॉलर के मुकाबले रुपया गिरने के कारण हो रही है। कच्चा तेल, गैस एवं जो भी सामान भारत आयात करता है, उसकी कीमत लगातार बढ़ती जा रही है। पेट्रोल-डीजल और गैस की कीमत बढ़ने का असर सभी चीजों पर पड़ेगा। जिसके कारण भारत में महंगाई बड़ी तेजी के साथ बढ़ाने की संभावना जताई जा रही है। भारत में खाद्य पदार्थ कच्चा तेल रासायनिक खाद तथा रोजाना उपयोग में आने वाले इलेक्ट्रॉनिक उपकरण इत्यादि के आयात से भारत की ज़रूरतें पूरी हो रही हैं। भारत का आयात लगातार बढ़ता चला जा रहा है। कच्चा तेल गैस इत्यादि का आयात पिछले वर्षों की तुलना में बढ़ गया है। लगभग 85 फ़ीसदी कच्चा तेल और गैस आयात करनी पड़ रही है। आयातित वस्तुओं का अधिकांश भुगतान डॉलर मुद्रा में होने से भारत के ऊपर इसका जबरदस्त प्रभाव पड़ रहा है। भारतीय रुपए की गिरावट का असर डॉलर के अलावा अन्य मुद्राओं में भी देखने को मिल रहा है। रिपोर्ट मे कहा गया है, रिजर्व बैंक आफ इंडिया को ब्याजदरों में वृद्धि करनी पड़ेगी। डॉलर के मुकाबले रुपए की गिरावट चार फ़ीसदी तक आ सकती है। भारत का राजस्व चालू खाते का घाटा दो फ़ीसदी और भी बढ़ सकता है। कच्चे तेल और गैस की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार मे कच्चे तेल की कीमतें न्यूनतम 105 डॉलर और अधिकतम 120 डॉलर प्रति बैरल की संभावना जताई गई है। इतना महंगा कच्चा तेल पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में था। पिछले 10 वर्ष में कच्चे तेल का भाव 60 से 70 डॉलर प्रति बेरल से अधिक कभी नहीं रहा। भारत में महंगा तेल आयात होने से विदेशी मुद्रा का संकट बढ़ेगा। राजकोषीय घाटा भी बढ़ेगा। इसके साथ-साथ महंगाई भी बड़ी तेजी के साथ बढ़ेगी। अर्थव्यवस्था में लगभग एक से डेढ़ फ़ीसदी गिरावट की बात रिपोर्ट में कही गई है। इसका बड़ा असर कृषि क्षेत्र में भी पडने जा रहा है। खाद को लेकर अभी मारामारी थी। अभी जो नया संकट सामने आया है, उसके बाद खाद का संकट भी बड़ी तेजी के साथ बढ़ेगा। जिसका असर कृषि उत्पादन में पड़ना तय है। पिछले चार माह में भारत का निर्यात व्यापार घटा है, जिसके कारण अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जो बदलाव हो रहे हैं उसका भारत की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। सरकार ने कभी सोचा नहीं था, अमेरिका और इजरायल का ईरान पर हमला भारत के लिए इतना भारी पड़ेगा। वर्तमान स्थिति को देखते हुए सरकार थोड़ा सजग और गंभीर हुई है। जिस तरह की स्थिति बन रही है, उसमे किसी को समझ नहीं आ रहा है, इस स्थिति से कैसे निपटा जाए। भारत पिछले कुछ वर्षों से अमेरिका और इजरायल के ऊपर आंख बंद करके आश्रित था। चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है। वर्तमान स्थिति में भारत अलग-थलग पड़ गया है। भारत के कारोबारियों का बहुत बड़ा निवेश दुबई में है। इस युद्ध का असर दुबई में बड़े पैमाने पर देखने को मिल रहा है। खाड़ी के देशों में भारत के लगभग 90 लाख से ज्यादा लोग काम करते थे, जो भारत के लिए विदेशी मुद्रा में रकम भेजते थे। युद्ध होने के कारण भारत को खाड़ी देशों से जो विदेशी मुद्रा हर महीने आती थी, भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में उसकी बड़ी अहमियत थी। प्रवासी भारतीयों द्वारा जो विदेशी मुद्रा भारत को भेजी जाती थी, उसमें लगातार गिरावट आ रही है। जिसके कारण भारत का विदेशी मुद्रा भंडार का संकट लगातार बढ़ता चला जा रहा है। ब्रिक्स संगठन मे शामिल देश डॉलर मुद्रा की दादागिरी से बाहर निकलना चाहते हैं। ट्रंप की दादागिरी के विरोध में प्रत्यक्ष रूप से रूस, चीन, उत्तर कोरिया और अन्य देश सामने आए हैं। वैश्विक व्यापार संधि का अमेरिका द्वारा उल्लंघन करना, मनमाने टैरिफ लगाकर, अमेरिका ने सारी दुनिया के देशों को अपना दुश्मन बना लिया है। ऐसी स्थिति में दुनिया के देश डॉलर के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में डॉलर का एकाधिकार था। दुनिया के अधिकांश देश डॉलर मुद्रा से बाहर निकलना चाहते हैं। ऐसे समय पर अमेरिका और इजरायल के ऊपर आश्रित होकर भारत ने अपना सबसे बड़ा नुकसान किया है। ब्रिक्स संगठन के अध्यक्ष पद पर भारत है। अभी तक भारत ने इसकी बैठक नहीं बुलाई है। ईरान, अमेरिका और इजरायल के इस युद्ध में भारत की भूमिका मूकदर्शक की रही है। जिसके कारण भारत का सबसे बड़ा नुकसान होने जा रहा है। ईरान और रूस से भारत के संबंध अमेरिकी दबाव मे पहले की तुलना में बहुत नाजुक दौर से गुजर रहे हैं। भारत का रूस और ईरान विश्वास नहीं कर रहे हैं। अमेरिका के साथ नजदीकी होने के कारण चीन के साथ भारत के संबंध में भी दूरियां बढ़ रही हैं। भारत को सभी मोर्चे में एक साथ लड़ना पड़ रहा है। ऐसी स्थिति में भारत की चुनौतियां अन्य देशों के मुकाबले अधिक हैं। अमेरिका की विश्वसनीयता सारी दुनिया में समाप्त होती जा रही है। डोनाल्ड ट्रंप और नेतन्याहु के कारण इस वैश्विक संकट का सबसे ज्यादा असर भारत पर पड़ रहा है। भारतीय अर्थ विशेषज्ञ और भारत की विदेश नीति और कूटनीति के जानकार पिछले कई वर्षों से भारत सरकार को चेतावनी देते रहे हैं। सरकार ने अपनी नीति में कोई परिवर्तन नहीं किया। जब चीन ने भारत की सीमा पर अवैध रूप से कब्जा करने की कोशिश की। भारतीय विदेश मंत्री जयशंकर का, यह कहना, चीन की अर्थव्यवस्था भारत की तुलना में बहुत बड़ी है। हम चीन के साथ युद्ध नहीं लड़ सकते हैं। भारत की यह कमजोरी सारी दुनिया के देशों ने जान ली है। इसका असर वर्तमान में भारत पर होता हुआ दिख रहा है। ईएमएस / 25 मार्च 26