लेख
26-Mar-2026
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तिब्बत की हिमाच्छादित पर्वतमालाओं के बीच सदियों से एक ऐसा सांस्कृतिक खजाना सुरक्षित है जो न केवल भारत की बौद्धिक परंपरा का साक्षी है बल्कि समूची मानव सभ्यता की ज्ञान यात्रा को समझने की कुंजी भी प्रदान करता है। यह खजाना है संस्कृत के प्राचीन ग्रंथों का जो ताड़पत्रों पर लिखे गए और समय के थपेड़ों के बावजूद आज भी तिब्बती मठों की अलमारियों और संग्रहालयों में सुरक्षित पड़े हैं। इन ग्रंथों में धर्म दर्शन साहित्य इतिहास और समाज के विविध आयामों का ऐसा समृद्ध भंडार निहित है जिसकी तुलना विश्व की किसी भी प्राचीन ज्ञान परंपरा से की जा सकती है। इन पांडुलिपियों की विशेषता केवल उनकी प्राचीनता नहीं है बल्कि यह भी है कि इनमें से अनेक ऐसे मूल ग्रंथ हैं जो भारत में अब उपलब्ध नहीं हैं। उष्णकटिबंधीय जलवायु और संरक्षण की कमी के कारण भारत में हजारों प्राचीन पांडुलिपियां नष्ट हो गईं जबकि तिब्बत की ठंडी और शुष्क जलवायु ने इन्हें हजारों वर्षों तक सुरक्षित बनाए रखा। यही कारण है कि आज जब इन ग्रंथों की खोज और अध्ययन की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है तो यह भारत के खोए हुए ज्ञान को पुनः प्राप्त करने का एक दुर्लभ अवसर बनकर सामने आई है। इन ताड़पत्रों में बौद्ध धर्म के महायान परंपरा के अनेक आधार ग्रंथ सुरक्षित हैं जिनमें गूढ़ दार्शनिक विचारों का अत्यंत सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है। साथ ही इनमें केवल धार्मिक विचार ही नहीं बल्कि उस समय के सामाजिक ढांचे राजनीतिक व्यवस्था राजवंशों की वंशावलियां और प्रशासनिक व्यवस्थाओं के संकेत भी मिलते हैं। इस प्रकार ये ग्रंथ इतिहासकारों के लिए भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने दार्शनिकों और साहित्यकारों के लिए। इन पांडुलिपियों के अध्ययन से प्राचीन भारत और उसके पड़ोसी क्षेत्रों के बीच सांस्कृतिक आदान प्रदान की एक सजीव तस्वीर उभरकर सामने आती है। तिब्बत में संस्कृत ग्रंथों का यह भंडार अचानक सामने नहीं आया बल्कि इसके पीछे खोज और अनुसंधान का एक लंबा इतिहास है। बीसवीं सदी के प्रारंभ में कुछ विद्वानों ने इन ग्रंथों के अस्तित्व के बारे में सुना था किंतु उस समय इसे अधिक महत्व नहीं दिया गया। बाद में जब कुछ साहसी और जिज्ञासु अध्येताओं ने तिब्बत की यात्राएं कीं तब इस खजाने की वास्तविकता सामने आई। उन्होंने वहां के मठों में सुरक्षित पांडुलिपियों को देखा और समझा कि यह केवल धार्मिक ग्रंथों का संग्रह नहीं बल्कि एक पूरी सभ्यता का दस्तावेज है। इन ग्रंथों को पढ़ना और समझना एक अत्यंत कठिन कार्य है। इसका कारण यह है कि ये पांडुलिपियां विभिन्न लिपियों में लिखी गई हैं और कई बार इनमें प्रयुक्त भाषा भी सामान्य संस्कृत से भिन्न है। इसके लिए न केवल संस्कृत का गहन ज्ञान आवश्यक है बल्कि तिब्बती और चीनी भाषाओं का भी अध्ययन करना पड़ता है। साथ ही पांडुलिपि विज्ञान और प्राचीन लेखन शैली की समझ भी जरूरी होती है। यही कारण है कि इन ग्रंथों के अनुवाद और संपादन की प्रक्रिया बहुत धीमी गति से आगे बढ़ रही है। चीन ने इन पांडुलिपियों के अध्ययन के लिए संगठित प्रयास प्रारंभ किए हैं और विभिन्न विश्वविद्यालयों तथा अनुसंधान संस्थानों के माध्यम से इस दिशा में कार्य किया जा रहा है। वहां के विद्वान संस्कृत तिब्बती और अन्य प्राचीन भाषाओं का अध्ययन कर इन ग्रंथों को समझने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सहयोग की पहल की है ताकि इस कठिन कार्य को अधिक प्रभावी ढंग से पूरा किया जा सके। यह प्रयास न केवल अकादमिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत मूल्यवान है। इस संदर्भ में यह प्रश्न भी उठता है कि भारत इस प्रक्रिया में किस प्रकार की भूमिका निभा रहा है। यह तथ्य चिंताजनक है कि जिन ग्रंथों की रचना भारत में हुई वे आज दूसरे देशों के संरक्षण में हैं और उनके अध्ययन का नेतृत्व भी वही देश कर रहे हैं। भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह अपनी इस अमूल्य धरोहर को पुनः प्राप्त करने और उसके अध्ययन में सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करे। इसके लिए भारतीय विद्वानों को न केवल प्राचीन भाषाओं का अध्ययन करना होगा बल्कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से इस क्षेत्र में नई ऊर्जा भी लानी होगी। तिब्बत में सुरक्षित ये पांडुलिपियां केवल अतीत की स्मृति नहीं हैं बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी मार्गदर्शक हैं। इनमें निहित दार्शनिक विचार आज के समय में भी प्रासंगिक हैं और मानव जीवन के मूल प्रश्नों का उत्तर देने में सक्षम हैं। इसके अलावा इन ग्रंथों के माध्यम से हम यह भी समझ सकते हैं कि प्राचीन काल में ज्ञान का संचार किस प्रकार होता था और विभिन्न सभ्यताएं किस प्रकार एक दूसरे से जुड़ी हुई थीं। यह खजाना हमें यह भी सिखाता है कि ज्ञान की कोई सीमाएं नहीं होतीं और उसे सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी समूची मानवता की होती है। यदि इन पांडुलिपियों को समय रहते संरक्षित न किया जाता तो संभवतः हम अपने अतीत के एक महत्वपूर्ण हिस्से से हमेशा के लिए वंचित हो जाते। इसलिए यह आवश्यक है कि हम न केवल इन ग्रंथों का अध्ययन करें बल्कि उन्हें आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित भी रखें। अंततः तिब्बत में सुरक्षित संस्कृत ग्रंथों का यह भंडार एक ऐसा सेतु है जो अतीत और वर्तमान को जोड़ता है। यह हमें हमारी जड़ों से जोड़ने के साथ साथ यह भी बताता है कि ज्ञान की यात्रा कभी समाप्त नहीं होती। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम इस धरोहर को पहचानें उसकी महत्ता को समझें और उसे सहेजने के लिए सामूहिक प्रयास करें। तभी हम इस अनमोल खजाने का सही अर्थों में उपयोग कर सकेंगे और मानव सभ्यता के विकास में उसका योगदान सुनिश्चित कर पाएंगे। (वरिष्ठ पत्रकारों साहित्यकार स्तम्भकार) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 26 मार्च /2026