लेख
26-Mar-2026
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आज राम नवमी का पावन पर्व हमें केवल उत्सव मनाने का अवसर नहीं देता बल्कि यह हमें अपने जीवन को सही दिशा में ले जाने की प्रेरणा भी देता है। भगवान राम का स्मरण होते ही मन श्रद्धा और भक्ति से भर उठता है। सहस्राब्दियों बीत जाने के बाद भी राम का नाम आज भी जन जन के हृदय में उसी आस्था के साथ विद्यमान है। इसका कारण यह है कि राम ने केवल उपदेश नहीं दिए बल्कि अपने जीवन के प्रत्येक क्षण में आदर्शों को जिया। यही कारण है कि वे हर वर्ग हर युग और हर परिस्थिति में पूजनीय बने हुए हैं। यह संसार निरंतर परिवर्तनशील है। जन्म और मृत्यु का क्रम अनवरत चलता रहता है। हर क्षण अनेक लोग जन्म लेते हैं और अनेक इस संसार से विदा हो जाते हैं। ऐसे में सभी को याद रखना संभव नहीं होता। इतिहास उन्हीं को याद रखता है जिन्होंने अपने जीवन को सार्थक बनाया हो और दूसरों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने हों। राम का जीवन इसी सत्य का सर्वोत्तम उदाहरण है। उन्होंने अपने जीवन को इस प्रकार जिया कि वे केवल अपने समय के ही नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भी मार्गदर्शक बन गए। राम का व्यक्तित्व अत्यंत व्यापक और बहुआयामी है। वे एक आदर्श पुत्र हैं जिन्होंने पिता की आज्ञा को सर्वोपरि माना। वे एक आदर्श भाई हैं जिनका भरत के प्रति प्रेम अद्वितीय है। वे एक आदर्श पति हैं और एक आदर्श राजा भी हैं जिन्होंने अपने सुख से पहले प्रजा के सुख को महत्व दिया। उनके जीवन का प्रत्येक पक्ष हमें यह सिखाता है कि यदि हम अपने कर्तव्यों का पालन ईमानदारी और समर्पण के साथ करें तो जीवन में संतुलन और शांति संभव है। राम नाम की महिमा भी अत्यंत अद्भुत है। गोस्वामी तुलसीदास ने राम नाम को मणि दीप कहा है जो भीतर और बाहर दोनों ओर के अंधकार को दूर करता है। यह केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं बल्कि एक गहन आध्यात्मिक सत्य है। जब व्यक्ति श्रद्धा और विश्वास के साथ राम का नाम स्मरण करता है तो उसके भीतर के विकार धीरे धीरे समाप्त होने लगते हैं। मन में शांति और स्थिरता का अनुभव होने लगता है। यही वह स्थिति है जहां से वास्तविक सुख की शुरुआत होती है। राम नाम के दो अक्षर रा और म अपने आप में गहन अर्थ रखते हैं। जब रा का उच्चारण होता है तो मन के विकार बाहर निकलते हैं और जब म बोला जाता है तो जैसे एक द्वार बंद हो जाता है जिससे वे विकार पुनः भीतर प्रवेश नहीं कर पाते। यह प्रतीकात्मक व्याख्या हमें यह सिखाती है कि यदि हम सचेत होकर अपने जीवन को नियंत्रित करें तो हम अपने भीतर की नकारात्मकता को दूर कर सकते हैं। आज का मनुष्य जीवन में आराम और सुख चाहता है लेकिन अक्सर वह उन साधनों को अपनाता है जो अंततः उसे दुःख की ओर ले जाते हैं। महावीर ने स्पष्ट कहा है कि सभी प्राणी सुख चाहते हैं और दुःख से बचना चाहते हैं। लेकिन सुख प्राप्त करने के लिए सही मार्ग का चयन आवश्यक है। यदि हम गलत साधनों का उपयोग करेंगे तो परिणाम भी गलत ही होगा। राम का जीवन हमें यही सिखाता है कि सच्चा सुख त्याग और संयम में है न कि भोग और आसक्ति में। राम के जीवन का वनवास प्रसंग इस संदर्भ में अत्यंत प्रेरणादायक है। जब उन्हें चौदह वर्ष का वनवास मिला तो उन्होंने इसे दुःख के रूप में नहीं बल्कि एक अवसर के रूप में स्वीकार किया। उन्होंने न तो क्रोध किया और न ही किसी प्रकार का विरोध। इसके विपरीत वे प्रसन्नता के साथ वन को चले गए। यह उनकी मानसिक शक्ति और सकारात्मक दृष्टिकोण का प्रमाण है। आज यदि हमारे जीवन में छोटी सी भी समस्या आ जाती है तो हम विचलित हो जाते हैं जबकि राम हमें सिखाते हैं कि हर परिस्थिति को धैर्य और संतुलन के साथ स्वीकार करना चाहिए। वर्तमान समय में समाज में जो मूल्यहीनता और स्वार्थपरता बढ़ती जा रही है वह चिंताजनक है। रिश्तों में प्रेम और सम्मान की कमी होती जा रही है। परिवारों में तनाव और समाज में असंतुलन बढ़ रहा है। इसका मुख्य कारण यह है कि हमने अपने जीवन से आदर्शों को दूर कर दिया है। हमने भौतिक सुखों को ही जीवन का लक्ष्य मान लिया है और आध्यात्मिकता को पीछे छोड़ दिया है। यदि हम राम के आदर्शों को अपने जीवन में पुनः स्थापित करें तो इन समस्याओं का समाधान संभव है। राम केवल एक नाम नहीं बल्कि एक जीवन दर्शन हैं। वे हमें सिखाते हैं कि विनम्रता सरलता और करुणा जैसे गुण जीवन को सुंदर बनाते हैं। यदि हम अपने व्यवहार में इन गुणों को अपनाएं तो हमारे रिश्ते मजबूत होंगे और समाज में समरसता बढ़ेगी। राम का जीवन यह भी सिखाता है कि सच्ची महानता त्याग में है। उन्होंने राज्य का त्याग करके यह सिद्ध किया कि पद और सत्ता से अधिक महत्वपूर्ण है कर्तव्य और मर्यादा। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम केवल राम का नाम लेने तक सीमित न रहें बल्कि उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारें। मंदिरों में जाकर पूजा करना महत्वपूर्ण है लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है अपने आचरण को शुद्ध करना। जब तक हमारे भीतर परिवर्तन नहीं आएगा तब तक बाहरी पूजा का कोई विशेष अर्थ नहीं रह जाएगा। राम नवमी का यह पर्व हमें यही संदेश देता है कि हम अपने भीतर के अंधकार को दूर करें और अपने जीवन में प्रकाश का संचार करें। समाज में व्याप्त समस्याओं के लिए केवल परिस्थितियों को दोष देना उचित नहीं है। इन समस्याओं के मूल में कहीं न कहीं हमारी अपनी कमजोरियां ही हैं। यदि हम अपने दोषों को पहचान कर उन्हें सुधारने का प्रयास करें तो जीवन में सकारात्मक परिवर्तन संभव है। यह कार्य कठिन अवश्य है लेकिन असंभव नहीं। निरंतर प्रयास और दृढ़ संकल्प से हम अपने जीवन को बेहतर बना सकते हैं। अंततः यह कहा जा सकता है कि राम नवमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं बल्कि आत्मचिंतन का अवसर है। यह हमें अपने जीवन को परखने और उसे सही दिशा देने की प्रेरणा देता है। यदि हम इस अवसर का सही उपयोग करें और अपने भीतर रामत्व को जागृत करें तो न केवल हमारा जीवन सुधरेगा बल्कि समाज में भी सकारात्मक परिवर्तन आएगा। यही इस पावन पर्व का वास्तविक उद्देश्य है कि हम अपने मन में राम को बसाएं और अपने जीवन को आदर्शों से परिपूर्ण बनाएं। (वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार स्तम्भकार) .../ 26 मार्च /2026