बिलासपुर (ईएमएस)। हाईकोर्ट ने एक मामले में आदेश दिया कि बिना विभागीय जांच के सजा नहीं दी जा सकती। कोरबा निवासी केके. पाण्डेय पुलिस अधीक्षक कार्यालय कोरबा में निरीक्षक के पद पर पदस्थ थे। उक्त पदस्थापना के दौरान उन्हें पुलिस अधीक्षक, कोरबा द्वारा एक आपराधिक मामले के समंस वारंट तामीली में लापरवाही के आरोप में कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। निरीक्षक पाण्डेय द्वारा कारण बताओ नोटिस के दिए गए जवाब से असंतुष्ट होकर एसपी कोरबा द्वारा उन्हे एक वेतनवृद्धि एक वर्ष के लिए असंचयी प्रभाव से रोके जाने के दण्ड से दण्डित किया गया। उक्त दण्डादेश से क्षुब्ध होकर पाण्डेय द्वारा अधिवक्ता अभिषेक पाण्डेय एवं ऋषभदेव साहू के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दण्डादेश को चुनौती दी गई। कोर्ट के समक्ष यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि नियमों में यह प्रावधान है कि यदि किसी शासकीय अधिकारी-कर्मचारी के विरुद्ध किन्ही आरोपों पर कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब मांगा जाता है और उक्त अधिकारी कर्मचारी उसके ऊपर लगाये गए आरोपों से पूर्णत: इंकार करता है, तो अनुशासनात्मक अधिकारी को पूर्ण कारण दर्शाते हुए उक्त अधिकारी-कर्मचारी के विरूद्ध आरोप पत्र जारी कर विभागीय जांच किया जाना अनिवार्य है। याचिकाकर्ता के मामले में पुलिस अधीक्षक कोरबा द्वारा बिना कोई आरोप पत्र जारी किये एवं बिना विभागीय जांच के दण्डित किया गया। कोर्ट ने याचिका स्वीकार कर याचिकाकर्ता के विरुद्ध पारित दण्डादेश को निरस्त कर दिया गया। मनोज राज 01 अप्रैल 2026