06-Apr-2026


हाईकोर्ट का हस्तक्षेप से इंकार : 10 साल देर से दाखिल याचिका खारिज जबलपुर, (ईएमएस)। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायाधीश प्रदीप मित्तल की संयुक्तपीठ ने दो से अधिक संतान होने के आधार पर की गई एक कर्मचारी की बर्खास्तगी को सही ठहराते हुए मामले में हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया। लगभग 10 साल के बिलंब से दायर उक्त याचिका को निरस्त करते हुए पने आदेश में संयुक्तपीठ ने कहा कि सेवा शर्तों का उल्लंघन होने पर राहत नहीं दी जा सकती। रीवा जिले के ग्राम पड़रिया निवासी बृजलाल साकेत की ओर से दायर याचिका में आवेदक ने अपनी बर्खास्तगी को चुनौती दी थी। प्रकरण के मुताबिक याचिकाकता को 20 जनवरी 2015 को रीवा जिला न्यायालय में ड्राइवर पद पर अस्थायी नियुक्ति मिली थी। उक्त नियुक्ति आदेश में स्पष्ट शर्तइ थी कि दो से अधिक संतान नहीं होनी चाहिए। नौकरी के महज 89 दिनों के भीतर ही तीसरी संतान होने के आधार पर 3 दिसंबर 2015 को याचिकाकता की सेवा समाप्त कर दी गई। इसके बाद याचिकाकर्ता रोज़गार की तलाश में सूरत चला गया और मजदूरी करने लगा। बाद में याचिकाकर्ता को वर्ष 2018 में उच्च न्यायालय के एक फैसले की जानकारी मिली, जिसमें तीसरी संतान के बावजूद पुनर्बहाली का आदेश दिया गया था। इसी आधार पर उसने वर्ष 2025 में उक्त याचिका दायर की। याचिका पर सुनवाई के दौरान अनावेदकों की ओर से अधिवक्ता संदीप शुक्ला ने पक्ष रखा। न्यायालय ने मामले में दोनां पक्षें की दलीलें सुनने और सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद अपने आदेश में कहा कि नियुक्ति आदेश में दो से अधिक संतान पर स्पष्ट प्रतिबंध था। याचिकाकर्ता इस शर्त का उल्लंघन कर रहा था। लिहाजा कर्मचारी की बर्खास्तगी उचित मानी जाएगी। इसके अलावा याचिकाकता की बर्खास्तगी 2015 में हुई और उसकी ओर से याचिका वर्ष 2025 में दायर की गई। इस तरह लगभग 10 वर्ष की देरी को संयुक्तपीठ ने गंभीर मानते हुए कहा कि इतने लंबे समय में संबंधित पद भर भी गया होगा। अब उक्त मामले में दखल देने कपा कापेई औ‎चित्य नहीं है। इस मत के साथ न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी। अजय पाठक / मोनिका / 06 अप्रैल 2026/ 03.16