वॉशिंगटन (ईएमएस)। ताइवान को अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सुरक्षा के लिए ‘सेल्फ-डिटरेंस’ यानी आत्म-निरोधक क्षमता विकसित करनी होगी। एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, यह रणनीति आक्रामक सैन्य विस्तार की नहीं, बल्कि संभावित हमले की लागत और जोखिम को इतना बढ़ाने की है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के लिए कोई भी कार्रवाई करना कठिन हो जाए। रिपोर्ट में बताया गया है कि चीन की ओर से खतरे केवल सैद्धांतिक नहीं हैं, बल्कि वे लगातार सैन्य गतिविधियों, साइबर हमलों और दुष्प्रचार अभियानों के रूप में सामने आ रहे हैं। चीनी लड़ाकू विमान बार-बार ताइवान स्ट्रेट की मध्य रेखा पार कर रहे हैं, जिससे क्षेत्र में तनाव और अस्थिरता बढ़ रही है। इसके अलावा, साइबर हमलों के जरिए ताइवान के सरकारी ढांचे को निशाना बनाया जा रहा है, जबकि फर्जी सूचनाओं के माध्यम से जनता के भरोसे को कमजोर करने की कोशिश हो रही है। रिपोर्ट के अनुसार, बीजिंग की रणनीति डर का माहौल बनाकर यह संदेश देना है कि ताइवान का भविष्य पहले से तय है। रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि केवल लोकतांत्रिक व्यवस्था होना किसी देश की सुरक्षा की गारंटी नहीं है। इतिहास में कई उदाहरण हैं जहां पर्याप्त रक्षा क्षमता के अभाव में लोकतांत्रिक देश बाहरी हमलों का शिकार हुए हैं। हालांकि, ताइवान की भौगोलिक स्थिति को उसकी बड़ी ताकत बताया गया है। पहाड़ी इलाकों, घनी आबादी और संकरे समुद्री मार्गों के कारण यहां सैन्य अभियान चलाना बेहद चुनौतीपूर्ण हो सकता है। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि ताइवान को मोबाइल मिसाइल सिस्टम, मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर और विकेंद्रीकृत कमांड सिस्टम पर निवेश बढ़ाना चाहिए। साथ ही नागरिकों को सिविल डिफेंस ट्रेनिंग देकर संभावित संकट के लिए तैयार करना जरूरी है। रिपोर्ट के निष्कर्ष में कहा गया है कि ताइवान का लक्ष्य चीन को हराना नहीं, बल्कि किसी भी हमले को इतना महंगा और जोखिम भरा बना देना है कि वह कदम उठाने से पहले ही पीछे हट जाए। सुदामा/ईएमएस 09 अप्रैल 2026