ट्रेंडिंग
11-Apr-2026
...


नई दिल्ली (ईएमएस)। खाड़ी में बढ़ते तनाव के बीच शनिवार से शुरू हो रही अमेरिका-ईरान वार्ता पर पूरी दुनिया की नजरें बनी हुई हैं। एक ओर इससे शांति की उम्मीदें जागी हैं, वहीं इस कूटनीतिक हलचल ने भारत की विदेश नीति, पाकिस्तान की बढ़ती भूमिका लेकर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कांग्रेस महासचिव और राज्यसभा सांसद नेता जयराम रमेश ने एक्स पर लिखा कि अमेरिका-ईरान की बैठक शनिवार को इस्लामाबाद में शुरू हो रही है। भारत सहित पूरी दुनिया यह उम्मीद कर रही है कि यह दोनों देशों के बीच एक स्थायी शांति की शुरुआत होगी, बस इस शांति वार्ता को इजरायल की जारी आक्रामकता पटरी से न उतार दे। लेकिन स्वयंभू विश्वगुरु की झप्पी कूटनीति के सार पर गंभीर सवाल उठते हैं। अप्रैल 2025 के कायरतापूर्ण पहलगाम हमले में अपनी भूमिका और उसके बाद भारत द्वारा पाकिस्तान को अलग-थलग करने के लिए उठाए गए कूटनीतिक प्रयासों के बावजूद पाकिस्तान ने अपने लिए यह नई भूमिका कैसे बना ली? यह विफलता इसलिए और गंभीर है क्योंकि डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने नवंबर 2008 के मुंबई आतंकी हमलों के बाद पाकिस्तान को असरदार रूप से अलग-थलग किया गया था। नमस्ते ट्रंप,हाउडी मोदी और फिर ट्रंप सरकार जैसे कैंपेन के बावजूद भारत ने अमेरिका को पाकिस्तान को यह नई भूमिका देने की इजाज़त कैसे दी? भारत ने एकतरफा व्यापार समझौते पर भी सहमति दी, जिसमें उसने जितना पाया, उससे कहीं अधिक दिया। ब्रिक्स प्लस के वर्तमान अध्यक्ष के रूप में भारत ने कोई शांति या मध्यस्थता की पहल क्यों नहीं की, खासकर तब, जब ईरान, यूएई और सऊदी अरब ब्रिक्स प्लस के सदस्य हैं? बीते 18 महीनों में चीन के प्रति भारत की संतुलित आत्मसमर्पण की नीति से देश को क्या हासिल हुआ-खासकर तब, जब ऑपरेशन सिंदूर के जवाब में पाकिस्तान की भूमिका में चीन की केंद्रीय भूमिका रही है और वह लगातार पाकिस्तान को समर्थन देता रहा है? आशीष दुबे / 11 अप्रैल 2026