वॉशिंगटन,(ईएमएस)। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की शख्सियत में विजेता होने की छवि इस कदर रची-बसी है कि वे अपनी सबसे बड़ी विफलताओं को भी स्क्रिप्ट की तरह मोड़कर जीत के रूप में पेश करने में माहिर माने जाते हैं। उनके इस जुझारू व्यक्तित्व की नींव 2004 में द अप्रेंटिस शो के दौरान ही पड़ गई थी, जहाँ उन्होंने पहली बार अपने अरबों डॉलर के कर्ज और संघर्षों का जिक्र एक सोची-समझी कहानी की तरह किया था। ट्रंप की यही आदत आज उनकी राजनीति का सबसे मजबूत हथियार बन चुकी है। ट्रंप के लिए दुनिया केवल विजेता और हारने वाले के बीच बंटी हुई है। 2020 के चुनावों में स्पष्ट हार के बावजूद उनका बार-बार जीत का दावा करना इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। वे अच्छी तरह जानते हैं कि यदि किसी झूठ को बार-बार और आत्मविश्वास के साथ दोहराया जाए, तो समर्थक उसे सच मानने लगते हैं। उनके पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन कहते हैं कि परिस्थितियाँ चाहे कैसी भी हों, ट्रंप कभी भी अपनी जीत घोषित करने से नहीं चूकते। यहाँ तक कि हालिया ईरान संघर्ष में, जहाँ वैश्विक अर्थव्यवस्था डगमगा गई और होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने के कगार पर पहुँच गया, ट्रंप ने इसे अमेरिका की रणनीतिक जीत करार दिया। ट्रंप की यह कभी न झुकने वाली मानसिकता उनके शुरुआती कारोबारी दिनों की देन है। 1973 में नस्ली भेदभाव के एक मुकदमे के दौरान मशहूर वकील रॉय कोहन ने उन्हें सलाह दी थी कि वे पीछे हटने के बजाय पलटवार करें। ट्रंप ने उस मुकदमे में समझौता तो किया, लेकिन सार्वजनिक तौर पर इसे अपनी जीत बताया क्योंकि उन्होंने अपनी गलती स्वीकार नहीं की थी। यही पैटर्न उनके व्यापारिक जीवन में भी दिखा, जहाँ उनके कई उत्पाद—जैसे स्टेक्स, एयरलाइन और ट्रंप यूनिवर्सिटी—असफल रहे, लेकिन वे हमेशा खुद को एक सफल डीलमेकर बताते रहे। ट्रंप के व्यक्तित्व का यह पहलू गोल्फ कोर्स से लेकर व्हाइट हाउस की मैसेजिंग तक फैला हुआ है। उन्होंने अपने गोल्फ क्लबों में उन टूर्नामेंटों में भी जीत का दावा किया जिनमें वे शामिल तक नहीं हुए थे। विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप एक ऐसी काल्पनिक दुनिया में रहते हैं जहाँ वे अपनी हकीकत खुद लिखते हैं। उनके लिए असफलता जैसा कोई शब्द नहीं है; वह केवल एक ऐसी कहानी है जिसे अभी तक जीत का शीर्षक मिलना बाकी है। वीरेंद्र/ईएमएस 14 अप्रैल 2026