तेहरान(ईएमएस)। पाकिस्तान में ईरान और अमेरिका के बीच हाल ही में हुई शांति वार्ता के बेनतीजा रहने के बाद पश्चिम एशिया में युद्ध के नगाड़े और तेज हो गए हैं। इस पूरे कूटनीतिक टकराव का केंद्र अब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बन गया है, जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है। वर्तमान स्थिति यह है कि यह समुद्री रास्ता न तो पूरी तरह खुला है और न ही आधिकारिक तौर पर बंद, लेकिन ईरान ने इस मार्ग से गुजरने वाले वाणिज्यिक जहाजों पर अपना कड़ा नियंत्रण स्थापित कर रखा है। इस तनावपूर्ण माहौल के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयान ने आग में घी डालने का काम किया है। ट्रंप ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि अमेरिकी नौसेना तुरंत प्रभाव से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की नाकेबंदी की प्रक्रिया शुरू करेगी। ट्रंप का तर्क है कि अमेरिका इस मार्ग को पूरी तरह नियंत्रित कर आवाजाही सुनिश्चित करना चाहता है, जबकि उनका आरोप है कि ईरान इसमें बाधाएं उत्पन्न कर रहा है। अमेरिका का यह आक्रामक रुख संकेत देता है कि वह अब इस समुद्री मार्ग को कूटनीतिक सौदेबाजी के बजाय एक रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने के मूड में है। यह स्थिति सीधे तौर पर तेल की जंग में तब्दील होती दिख रही है, जिसमें राजनीति, रणनीति और वैश्विक अर्थव्यवस्था तीनों आपस में उलझ गए हैं। ईरान अपने आर्थिक हितों और संप्रभुता को बचाने के लिए इस रास्ते का इस्तेमाल कर रहा है, तो दूसरी तरफ अमेरिका उस पर अधिकतम दबाव बनाने के लिए नाकेबंदी का सहारा ले रहा है। भारत के लिए यह संकट अत्यंत गंभीर है, क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से होने वाले आयात से पूरा करता है। हालांकि, भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कमर कस ली है। विदेश मंत्री एस जयशंकर की हालिया यूएई यात्रा और वहां के राष्ट्रपति के साथ हुई मुलाकात इसी दिशा में एक बड़ा कदम है। भारत अब अपने क्रूड ऑयल बास्केट के फॉर्मूले में बड़ा बदलाव कर रहा है। आपूर्ति में किसी भी संभावित रुकावट से बचने के लिए भारत अब ओमान और दुबई ग्रेड के तेल पर निर्भरता कम कर अन्य सुरक्षित देशों से तेल खरीदने की रणनीति अपना रहा है। यदि यह जलमार्ग पूरी तरह ब्लॉक होता है, तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बेतहाशा बढ़ सकती हैं, जो दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका होगा। वीरेंद्र/ईएमएस 14 अप्रैल 2026