लेख
15-Apr-2026
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यदि महिलाएं सशक्त होती हैं और देश के शासन-प्रशासन में उनकी भागीदारी बढ़ती है, तो हमारे लोकतंत्र और समाज के लिए इससे बेहतर भला और क्या होगा। आधी आबादी को उनका हक मिलना सिर्फ न्याय नहीं, बल्कि राष्ट्र की प्रगति के लिए अनिवार्य है। लेकिन जब हम महिला आरक्षण से जुड़े हालिया घटनाक्रमों और इसके कानूनी पेचीदगियों को देखते हैं, तो साफ नजर आता है कि सरकार की मंशा इस मुद्दे पर पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। ऐसा लगता है कि इसे वास्तविक सशक्तिकरण के बजाय एक राजनीतिक हथियार के तौर पर अधिक इस्तेमाल किया जा रहा है। इस कानून की सबसे बड़ी और बुनियादी कमी इसका शर्तों में बंधा होना है। सरकार ने बिल तो पास कर दिया, लेकिन इसके साथ एक ऐसी शर्त जोड़ दी जिसने इसे फिलहाल एक भविष्य का वादा बनाकर छोड़ दिया है। कानून के मुताबिक, आरक्षण तभी लागू होगा जब नई जनगणना होगी और उसके आधार पर सीटों का नया बंटवारा यानी परिसीमन होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस लंबी प्रक्रिया के कारण यह आरक्षण 2029 या शायद 2034 तक खिंच सकता है। सवाल यह उठता है कि अगर नीयत साफ थी, तो इसे तुरंत मौजूदा सीटों पर ही क्यों लागू नहीं किया गया? जनगणना और परिसीमन जैसी उलझी हुई प्रक्रियाओं के साथ जोड़कर सरकार ने इसे एक ऐसे रास्ते पर डाल दिया है, जिसकी मंजिल का फिलहाल कोई पता नहीं है। जैसे ही सरकार सीटों के नए बंटवारे की बात करती है, दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंता बढ़ जाती है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों ने पिछले कई सालों में जनसंख्या को काबू करने के लिए बहुत अच्छा काम किया है। अब तकनीकी दिक्कत यह है कि यदि सीटों का फैसला केवल आबादी के आधार पर होता है, तो उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों की लोकसभा सीटें बहुत ज्यादा बढ़ जाएंगी और दक्षिण का राजनीतिक वजन कम हो जाएगा। आंकड़ों के हिसाब से देखें तो उत्तर भारत के कुछ राज्यों में सीटें अस्सी प्रतिशत तक बढ़ सकती हैं, जबकि दक्षिण में यह बढ़ोतरी बहुत कम होगी। दक्षिण के राज्यों का कहना है कि उन्हें अच्छा काम करने की सजा दी जा रही है। सरकार ने इस क्षेत्रीय विवाद को सुलझाने का कोई पक्का रास्ता बताए बिना ही महिला आरक्षण को सीटों के बंटवारे से जोड़ दिया। इससे यह डर पैदा हो गया है कि महिलाओं को हक देने के नाम पर कहीं देश के अलग-अलग हिस्सों के बीच का तालमेल ही न बिगड़ जाए। इस बिल की एक और बड़ी व्यावहारिक चिंता प्रॉक्सी संस्कृति और रसूखदार राजनीतिक घरानों का कब्जा है। इसे आसान भाषा में समझें तो यह नाम महिला का और काम पुरुष का वाली स्थिति है। गाँवों की पंचायतों में हमने अक्सर देखा है कि महिला चुनाव तो जीत जाती है, लेकिन दफ्तर में उसके पति, पिता या भाई बैठते हैं और सारे फैसले वही लेते हैं। इसे ही पति-सरपंच संस्कृति कहा जाता है। अब डर यह है कि विधानसभा और संसद में भी यही होगा। राजनीतिक पार्टियां जमीन से जुड़ी संघर्षशील महिलाओं के बजाय उन्हीं महिलाओं को टिकट देंगी जो पहले से ताकतवर राजनीतिक परिवारों से आती हैं। यानी एक आम महिला के लिए संसद के दरवाजे अभी भी बंद रह सकते हैं, क्योंकि आज के दौर में चुनाव लड़ना बहुत महंगा हो चुका है और महिलाओं के पास अपने खर्च के लिए पैसे नहीं होते। बिना सरकारी मदद या चुनावी खर्च में छूट के, यह आरक्षण केवल अमीर वर्ग की महिलाओं तक सिमट कर रह जाएगा। इसके अलावा, राज्यसभा और राज्यों की विधान परिषदों को इस आरक्षण से बाहर रखना भी एक बड़ी खामी है। लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या अभी बहुत कम है, फिर भी बड़े सदनों में उनकी भागीदारी पर चुप रहना सरकार की सोच पर सवाल उठाता है। साथ ही, पार्टियों के भीतर लोकतंत्र की कमी एक और कड़वा सच है। जब तक टिकट बांटने वाली मुख्य कमेटियों में महिलाओं को जगह नहीं मिलती, तब तक चुनी गई महिला प्रतिनिधियों की ताकत केवल कागजों तक ही रहेगी। एक और कमी सीटों के बदलने का नियम है। हर चुनाव के बाद आरक्षित सीटें बदलने से नेताओं की अपने इलाके के प्रति जिम्मेदारी खत्म हो जाएगी, क्योंकि उन्हें पता होगा कि अगला चुनाव उन्हें वहां से लड़ना ही नहीं है। कुल मिलाकर, सरकार ने बिल पास करके सुर्खियां तो बटोर लीं, लेकिन इसे लागू करने में जो रुकावटें छोड़ी हैं, वे इसे एक अधूरा और जल्दबाजी में लिया गया फैसला साबित करती हैं। बिना किसी ठोस तैयारी के, केवल चुनाव की हवा को देखते हुए कानून बना देना लोकतंत्र के लिए सही संकेत नहीं है। जब तक जनगणना, सीटों के बंटवारे और दक्षिण-उत्तर के विवाद का कोई ऐसा हल नहीं निकलता जिससे सब सहमत हों, तब तक यह कानून केवल एक सुनहरा सपना ही रहेगा। असली सशक्तिकरण तब होता जब यह बिना किसी शर्त के और बिना किसी क्षेत्रीय डर के तुरंत लागू किया जाता। (लेखक पत्रकार हैं) ईएमएस / 15 अप्रैल 26