लेख
15-Apr-2026
...


आज जब हम 21वीं सदी के तीसरे दशक में खड़े हैं, तो एक कठोर सच्चाई हमें झकझोरती है—यह दुनिया जितनी समृद्ध कभी नहीं रही, उतनी ही असमान और असंतुष्ट भी कभी नहीं रही। विज्ञान ने चमत्कार किए हैं, तकनीक ने सीमाएँ तोड़ी हैं, और उत्पादन ने रिकॉर्ड बनाए हैं। फिर भी, भूख है, भय है, युद्ध है और भीतर एक गहरा असंतोष है। सवाल उठता है—आख़िर क्यों? संयुक्त राष्ट्र और विभिन्न वैश्विक संस्थाओं की रिपोर्टें बताती हैं कि दुनिया में इतना खाद्यान्न उत्पादन होता है कि हर व्यक्ति को पर्याप्त भोजन मिल सकता है। ऊर्जा के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व विस्तार हुआ है। फिर भी, करोड़ों लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन जी रहे हैं। यह विरोधाभास हमें एक ही निष्कर्ष तक ले जाता है—समस्या संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि उनके असमान वितरण और हमारी सोच की विकृति है। इसी संदर्भ में महात्मा गांधी का दर्शन आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठता है। गांधी जी ने स्पष्ट कहा था—“पृथ्वी हर व्यक्ति की आवश्यकता को पूरा कर सकती है, लेकिन हर व्यक्ति के लालच को नहीं।” यह केवल एक कथन नहीं, बल्कि आज के वैश्विक संकट का सटीक विश्लेषण है। आज का मानव “आवश्यकता” से नहीं, बल्कि “अतृप्त इच्छाओं” से संचालित हो रहा है। राष्ट्र अपनी सीमाओं की सुरक्षा से आगे बढ़कर संसाधनों पर नियंत्रण की होड़ में लगे हैं। ऊर्जा, जल और खनिज—ये अब जीवन के साधन नहीं, बल्कि शक्ति के प्रतीक बन गए हैं। हाल के वैश्विक संघर्षों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि संसाधनों पर वर्चस्व की यह लड़ाई कितनी विनाशकारी हो सकती है। हमारी आर्थिक व्यवस्था भी इस असंतुलन को गहरा करती है। जब विकास का केंद्र “मुनाफा” बन जाता है और “मानव” पीछे छूट जाता है, तब समृद्धि कुछ हाथों में सिमट जाती है। बड़ी कंपनियाँ और शक्तिशाली वर्ग संसाधनों पर अधिकार जमा लेते हैं, जबकि आम जन संघर्ष करता रह जाता है। यह केवल आर्थिक विफलता नहीं, बल्कि नैतिक पतन है। गांधी जी का “अपरिग्रह” हमें इसी संकट से बाहर निकलने का मार्ग दिखाता है। अपरिग्रह का अर्थ है—संतुलित जीवन, सीमित उपभोग और दूसरों के अधिकारों के प्रति संवेदनशीलता। यदि व्यक्ति, समाज और राष्ट्र इस सिद्धांत को अपनाएँ, तो संसाधनों पर अनावश्यक दबाव कम हो सकता है और संतुलन स्थापित हो सकता है। इसके साथ ही, गांधी जी का “ट्रस्टीशिप” का सिद्धांत आज के कॉर्पोरेट और आर्थिक ढांचे के लिए एक क्रांतिकारी विचार प्रस्तुत करता है। उन्होंने कहा था कि जिनके पास अधिक संपत्ति है, वे उसके मालिक नहीं, बल्कि संरक्षक हैं। यदि यह भावना विकसित हो जाए, तो संपत्ति का उपयोग केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि समाज के कल्याण के लिए किया जा सकता है। आज दुनिया को केवल नीतिगत सुधारों की नहीं, बल्कि नैतिक पुनर्जागरण की आवश्यकता है। हमें “मैं और मेरा” की सीमाओं को तोड़कर “हम और हमारा” की ओर बढ़ना होगा। जब तक हम स्वयं को एक वैश्विक परिवार का हिस्सा नहीं मानेंगे, तब तक शांति और संतुलन की कल्पना अधूरी रहेगी। सरकारों को ऐसी नीतियाँ बनानी होंगी जो शिक्षा, स्वास्थ्य और न्यूनतम जीवन स्तर को हर व्यक्ति का अधिकार बनाएँ। लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है—व्यक्तिगत स्तर पर परिवर्तन। हमें अपने उपभोग, अपनी आवश्यकताओं और अपनी जीवनशैली पर पुनर्विचार करना होगा। क्या हमें वास्तव में उतना ही चाहिए जितना हम इकट्ठा कर रहे हैं? या हम अनजाने में किसी और के हिस्से को छीन रहे हैं? आज का समय हमें एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा करता है। एक ओर वह मार्ग है जो हमें और अधिक प्रतिस्पर्धा, असमानता और संघर्ष की ओर ले जाता है। दूसरी ओर वह मार्ग है जो संतुलन, सहयोग और शांति की ओर जाता है। यह चयन हमें करना है। यदि हम गांधी के विचारों को केवल पुस्तकों तक सीमित न रखकर उन्हें अपने जीवन और नीतियों में उतारें, तो एक नई दुनिया की शुरुआत हो सकती है—एक ऐसी दुनिया जहाँ संपन्नता का अर्थ केवल संग्रह नहीं, बल्कि साझा करना हो; जहाँ विकास का उद्देश्य केवल आगे बढ़ना नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलना हो। समय आ गया है कि हम यह स्वीकार करें कि सच्ची प्रगति केवल तकनीकी उपलब्धियों से नहीं मापी जा सकती। सच्ची प्रगति वह है, जो हर व्यक्ति के जीवन में सम्मान, सुरक्षा और संतोष लाए। यदि हम यह परिवर्तन कर सके, तो “हाय-हाय” की जगह “संतोष” ले सकता है, “संघर्ष” की जगह “सहयोग” आ सकता है, और मानवता एक नए युग में प्रवेश कर सकती है। यही गांधी का सपना था—और शायद यही हमारी सबसे बड़ी आवश्यकता भी। (लेखक गांधी चौपाल के अध्यक्ष एवं कांग्रेस विचार विभाग के चेयरमेन हैं) ईएमएस / 15 अप्रैल 26